Saturday, 28 April 2018

Rape - Time to Think. (Hindi)

बलात्कार - यह शब्द तो आज इतना आम हो चला है जैसे बाजार में तरकारी। हर सुबह अखबार खोलने से डर लगता है कि कहीं आज भी तो नहीं किसी की अस्मत लूटी गई, कहीं आज भी तो दरिंदगी नहीं हुई। हर सुबह इस आशा से अखबार खोलता हूँ की शायद आज ऐसी खबर नहीं होगी। लेकिन अखबार के उन मटमैले पन्नो पर बड़े, काले रंगों में लिखा होता है फलाने जगह पड़ोसी महिला से बलात्कार, 6 माह की बच्ची के साथ, 80 साल की वृद्ध औरत के से बलात्कार। पिता, भाई, चाचा, पड़ोसी, बेटा क्या अहमियत है इन रिश्तों की? ज़रा से मांस के टुकड़े के लिए सारी मर्यादाओं को तार-तार किया जा रहा है। मानवीय मूल्य किस हद तक समाप्त होते जा रहे है इसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल है। कभी कभी तो डर लगता है समाज को बताने में भी की मेरे यहाँ भी घर मे कोई महिला है, न जाने कब किसका हैवान जग जाए। क्योंकि सबसे ज्यादा होने वाले बलात्कार तो जान- पहचान और रिश्तेदारों द्वारा ही किये जाते हैं।  आंकड़ों की माने तो 94.6 प्रतिशत बलात्कार करने वाले रिश्तेदार ही होते हैं, और उन होने वाले बलात्कार में से 10 में से 4 पीड़िता तो व्यस्क ही नहीं होती। एन. सी. आर. बी की माने तो एक दिन में 109 बलात्कार प्रतिदिन होते हैं, ये वो आंकड़े है जो पुलिस थाने में दर्ज होते और, और जो नहीं दर्ज होते वो कितने है किसी को नहीं पता, किसी पीड़िता को मार दिया जाता है, कभी पैसे देकर मुँह बंद कर देते हैं, कभी शादी करवा कर तो कभी रिश्तेदारी और बदनामी के डर से नहीं बताता कोई।
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हम तो उस देश मे रह रहे जहां पर मंदिर के पुजारी सुबह देवी माँ की आरती उतारते हैं और शाम को उसी मंदिर में जबरन बच्चियों की अस्मत। अब खैर उनको पुजारी  कहना व्यर्थ ही होगा, और हैवानों का तो कोई धर्म नहीं होता। वो हिन्दू भी हो सकता है मुसलमान भी सिख भी इसाई भी । पुजारी तो पुजारी अपने आपको संत, साधक और भगवान का अवतार कहने वाले न जाने कितने ही बाबाओं को कानून ने कटघरे में खड़ा किया है और उन पर बलात्कारियों का ठप्पा लगाया है।
दुःख तो तब होता है जब किसी की 6 साल की बच्ची के साथ ऐसी घटना घटित होती है और हमारी सरकार उसपर कड़े नियम बनाने औए सजा देने की बजाए उसपर राजनीति करती है और अपने वोट बैंक बचाने के लिए चुप्पी साधे रहती है। लेकिन हमारे देश में भी जिम्मेदार और संवेदनशील नेता भी है जो इन घटनाओं पर बयान देते है और कहते है कि लड़कों से गलतियाँ हो जाती है, दूसरी तरफ को चाऊमीन जैसे खाने को इसका जिम्मेवार ठहराता नज़र आता है तो कोई कहता है कि लड़की के कपड़े बेढंग के थे कोई कहता है जब हैवान ऐसी घटना को अंजाम दे रहे थे तब लड़की को उसे भाई बोल कर समझना चाहिए था। और मजे बात तो ये है कि जब ऐसी घटना होती है तो हमारे देेश का जिम्मेदार - जागरूक युवा निकल पड़ता है रात में मोमबत्तियां लेकर और अगले दिन क्या हुआ किसी को पता नहीं सारा जोश बुझ जाता है अगले दिन उस मोमबत्ती की तरह। चार दिन बातें होती है और निंदा होती है और फिर नमस्ते, जिसकी कहानी है अब वो जाने हमसे क्या मतलब। इसका कोई हल निकले या न निकले एक हाल जरूर निकलता माएं अपनी बेटियों को बाहर नहीं जाने देती और देती भी है तो हर घंटे की सुई के साथ उनकी धड़कने बढ़ती है।  खैर अब तो आदत पड़ गयी होगी सभी को यह सब सुनने की, क्योंकि जितनी बार आप एक माह में आपका फ़ोन रिचार्ज नहीं करवाते उतने तो एक दिन में बलात्कार हो जाते हैं, और  हम तो इतने आदर्शवादी समाज मे रहते ही कि अगर हमारे समाज की किसी बहन-बेटी के साथ घटना घटित होती है तो हम उसकी की आलोचना में लग जाते हैं और जो पहला ख्याल हमारे दिमाग में आता है वो यह, की अब इससे ब्याह कौन करेगा। छि: घिनौना लगता है कि मैं ऐसे समाज का हिस्सा हूं। क्या शादी के बस उतने ही मायने है? शरीर से बढ़ कर कुछ नहीं है जीवन में? क्या हमारे जीवन का मकसद मात्रा उतना ही है? या फिर शादी का मतलब यही है  ? या एक लड़की के जीवन की महत्ता बस इतनी ही है? 
जरूरत है हमें शिक्षा की नैतिक शिक्षा की, याद दिलाने की, कि इस जीवन का महत्व क्या है, हमारे मौलिक कर्तव्य क्या है, मर्यादाएं क्या है। ये तभी सम्भव है जब हम नैतिकता का पाठ पढ़े और पढ़ाए।
कष्ट होता है जब जम अपने देश को भारत माता कहते है और उसी भारत माता के आंचल के तले उसकी बेटियों से दरिंदगी होती है, और हम हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते है क्योंकि ऐसा हमारे साथ नहीं हुआ।
जरूरत है अपने अंदर के बूढ़े आदर्शवादी को जागने की और दुबारा से नैतिकता और आदर्शों का पाठ पढ़ाने की, ताकि कहीं हमारे  बूढ़े आदर्शों की चक्की में कोई बेटी ने पिस जाए।

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