Tuesday, 28 September 2021

चलें.. हमे अभी हज़रतगंज भी जाना है।

 सोनू जानते हो " ताऊ जी को paralysis का अटैक पैड गया, मां ने फ़ोन रखते ही चिंता भरी आवाज में सोनू से कहा, सोनू अपने फोन में भिड़ा हुआ था और उसने हम्म कह कर टाल दिया, फिर अचानक ठिठक कर पूछा हें? क्या हुआ? 

माँ ने लम्बी गहरी सांस ली और कहा विनोद के पापा को आज पैरालिसिस का अटैक आगया आज दोपहर में नल पर नहाने गए थे वही बेहोश होकर गिर गए, बांय तरफ का सारे हिस्से ने काम करना बंद कर दिया है।

सोनू ने एक ठंडी आह भरी और आपने अंदर के द्वंद से लड़ने लगा। कि वो कर भी क्या सकता है, उसके हाथ मे कुछ है ही नही बस ईश्वर से प्रार्थना करने के सिवा। और यही सच भी है आदमी कितनी भी कोशिशें कर ले पर ऊपर वाले के आगे किसकी चलती है पर इंसान का कर्तव्य है कोशिश करते रहना।

सोनू के पिताजी का देहांत अभी कुछ माह पहले ही हुआ था, बेचारे कोरोना की लहर से लड़ते लड़ते हार गए, या शायद इस लड़ाई में सरकार से लड़ते हुए हार गए, पर हार जरूर गए थे।

सोनू को आज तक यह भी नही पता कि उसके पिताजी का देहांत हुआ किन कारणों से, कोरोना से संक्रमित थे वह तो ठीक है पर हालत कब बिगड़ी? कब हुआ? उसे इसकी खबर क्यों नही थी। जितने रिश्तेदारों से मिलता है सब अपने अपने सिरे से बताते है कि क्या हुआ था, और सबकी कहानियों में उसे लूप होल नज़र आते हैं।

जब सोनू के पिताजी बीमार थे तब सोनू बाहर नौकरी पर था उसे विश्वास था उसके पिताजी ठीक हो जाएंगे और फिर दूसरे कमरे से बैठ कर आवाज से देंगे, भैया...!! और फिर हल्की आवाज में कहेंगे आज शाम को स्टाफ में शादी है मिश्रा जी के बेटे की चलोगे? कनिका, कुहू से भी पूछ लो, मम्मी को मत बताना अभी।

पर ऐसा हुआ नही, जब वह आखिरी समय मे घर आया तब डेढ़ घंटे पहले ही उसके पिताजी इस दुनिया को अलविदा कह गए थे। उस दिन जब वह सुबह-सुबह  बस से उतर कर सड़क पार कर रहा था तब उसके मामा और मौसा मिल गए उसे चुप चाप गाड़ी में बिठाया और घर की ओर चल दिये, सोनू इन सब से बेखबर था।

वह घर पहुँचा उसने अपना बैग रखा और दौड़ कर अपनी माँ के पास पहुँचा, माँ कमरे में पिताजी के पास बैठी थी, बदहवास। पिताजी एकदम शांत लेटे थे एक हल्का महरून रंग का कंबल ओढ़े उस कंबल पर तमाम फूल पत्ति बनी थी, जितनी बहार उस कम्बल में थी उतनी ही उदासीनता उस माहौल में थी। सोनू को एक पल के लिए लगा उसके पिताजी नही रहे पर उसे भरोसा था कि उसके साथ ऐसा नही हो सकता। इतना गंदा मज़ाक प्रकृति उसके साथ नहीं कर सकती अभी तो वह अपने सपने जीने के लिए बस तैयार हो रहा था, अपने पिताजी को हवाई जहाज में बिठाने के सपने बुन रहा था। और शायद हर इंसान इतना ही आशावादी होता है कि उसके साथ नहीं होगा कुछ। वह हिम्मत कर माँ की ओर मन भर के मुस्कुरा दिया। और  दरवाजे के पास जाकर अपने जूते खोलने लगा। एकाएक उसका फ़ोन बजा तो सचिन भैया फ़ोन कर रहे थे उसने फ़ोन उठाया और बोला, " हां भैया, प्रणाम मैं घर आया हु पापा जी की तबियत सही नही है अभी फोन करता हूँ।" इतना कह कर उसने फोन काट दिया। जैसे ही वह जूते उतार कर मुड़ा उसके मामा और मौसा ने उसके कंधे पर हाथ रख कर ज़ोर से दबा दिया। इतना सोनू के लिए काफी था। सोनू का पैर सूज चुका था, और उसके पैर में ज़ोर की टीस मच रही थी। अभी लगभग दस दिन पहले उसका एक्सीडेंट होगया था। वह लंगड़ाते हुए माँ के पास पहुँचा और उन्हें बस देखता रहा और माँ बेजान आंखों से उसे। सोनू ने अपने सारे आंसू दबा लिए जैसे वह जानता ही नही था की क्या हुआ। उसने धीमे से हिम्मत कर के अपने मामा से पूछा मामा क्या हुआ? मामा कुछ नही बोले, कहा कि कनिका, कुहू को बुला कर एक बार दर्शन करा दो।

सोनू के भीतर हिम्मत नहीं थी कि वह सीढियां चढ़ कर जाए और अपनी बहनों को यह बता सके कि बेटा आज के बाद से तुम्हारे सर पर पापा का साया कभी नही होगा।

खुदको को बहुत ढांढस बंधा कर सोनू मुस्कुराता हुआ छत पर दौड़ गया, और अपनी बहनों को जगाने लगा और जगा कर बोला उठो बच्चों मैं आगया, चलो दोनों लोग नीचे आजाओ फटाफट, उसने बहुत हिम्मत जुटाई पर सोनू हिम्मत हार गया, नही बता पाया कि बात क्या है।

थोड़ी देर में दोनों बहनें नीचे आगयी, सोई सोई आंखे एकदम बेखबर, उसने अपने से छोटी वाली को कैसे भी हिम्मत कर के बता दिया, पर सबसे छोटी वाली को क्या बताता, कैसे बताता, कितने सवाल करती वो, कहाँ से देता उन सवालों के जवाब।

सोनू एक बार फिर मुस्कुराया और दोनों से बोला आओ पापा के साथ फोटो खिंचा लो। उसके हाथ कांप रहे थे, दिमाग मे लाखों, करोड़ो सवालों का जत्था उसके सर में जैसे खून को जाम कर रहा हो। 

तीनो बच्चे अपनी माँ के बगल बैठ गए और अपने पिता के साथ आखिरी फोटो खिंचा के खड़े होगये, सबसे छोटी वाली अब भी बेखबर थी वह बोली, "भाई मुझे बहुत नींद आ रही है मैं सोने जा रही हूँ", सोनू बोला, "एक काम करो ब्रश कर के आ जाओ फिर सो जाना।" ऐसा कर सोनू ने अपने लिए वक़्त मांग लिया कि अब जब वो ब्रश कर के नीचे आएगी तो उससे पक्का बता देगा, तब तक नीचे एम्बुलेंस आ चुकी थी और छोटी वाली बहन भी कुछ 2 मिनट बाद नीचे आगयी सबने उसके पिता जी को टिकटी पर लिटाया और सोनू ने अपने दाहिने कंधे पर अपने पिता का मृत शरीर रख लिया, जिन कंधो पर वह कभी खेला था आज उनको अपने कंधे पर रखे लिए जा रहा था। उसकी सबसे छोटी वाली बहन बस इतना कह पाई, " "डोंट टेल मी डिस," उसके चेहरे पर यही भाव था कि मेरे पापा के साथ ऐसा नही हो सकता। पर सोनू के पास न जवाब था न हिम्मत बस अपने कंपकपाते कंधो पर वह अपने जा चुके पिताजी के भारी शरीर को उठाए जा रहा था, वह इतनी तेज भागना चाहता था अपने पिता को लेकर जहां उनसे वो बैठ कर दो मिनट बात कर सके, पर वो तो इतना अभागा था कि अपने पिता से न तो आखिरी पर 2 शब्द बोल पाया, शब्द बोलना तो दूर उन्हें छूना तक मना था...।

एकाएक सोनू की मां रोटी बेलते हुए बोली थोड़ा कम फोन चलाया करो सुन लिया करो। उसका ध्यान अचानक टूटा और बोला हम्म, अपने हाथ मे क्या है मम्मी जी बस ऊपर वाला ठीक कर दे सबको जल्दी यही प्रार्थना कर सकते हैं हम तो बस कोशिश कर सकते हैं।

हफ्ते भर बाद चेहल्लुम के दिन माँ की छुट्टी थी माँ बोली चलो ताऊजी जी को अस्पताल में देख आते हैं, सब फाइनल होगया ताऊजी सीतापुर में एक अस्पताल में भर्ती थे, अब हालात में कुछ सुधार था पर ब्लड प्रेशर की समस्या बनी हुई थी। जब सोनू अस्पताल पहुँचा तो ताऊजी को देख कर बिल्कुल उसके सामने उसके पिताजी का चेहरा नाच गया कैसे आंखे, नाक, माथा, चेहरा, चट्ट गोरा रंग सब मिलता था बस उसके पिताजी का मुंह थोड़ा गोल हुआ करता था। सोनू ताऊजी को समझा रहा था कि वह भी अपना ध्यान रखे ज्यादा नामक- चीनी खाने की जिद्द न करें, ताऊजी का बेटा  विनोद जनरल वार्ड में बैठा सोनू की माँ के सामने रो रहा था और माँ उसे ढांढस बंधा रही थी कि ईश्वर पर भरोसा रखो अपना ध्यान रखो, खाते पीते रहना , किसी चीज़ की जरूरत हो तो कहना और पापा गुस्सा करें तो बुरा मत मानना, अपना धर्म निभाते रहो पिता की सेवा करने का सुअवसर सबको नहीं मिलता... यह सुनते ही सोनू बात करते करते अचानक ठहर गया..।  इतना सुनते ही एक पल को सोनू का सर ऐसा चकराया मानो अभी वह अस्पताल की फर्श पर ही धराशाही हो जाएगा।

सोनू ने मां से कहा चलें मम्मी जी घर भी पहुँचना है और हमे अभी हज़रतगंज भी जाना है....।

Thursday, 8 July 2021

अजीब दास्तां है ये.. भाग-1

 सब कुछ छोड़ छाड़ कर हम लखनऊ के नए मोहल्ले में आगये थे।3200 स्क्वायर फ़ीट के मकान को अलविदा कर 350 स्क्वायर फ़ीट के घर में कदम रख चुके थे, पहले कॉलोनी में रहते थे अब मोहल्ले में अपना आशियाना है। बस सुकून इस बात का है कि छत अपने नाम की है।

इस मोहल्ले में आये तकरीबन हमे 3 महीने हो चलें हैं, 350 स्क्वायर फ़ीट के हमारे घर मे कुल मिलाकर ऊपर नीचे डब्बे जैसे 4 कमरे हैं। मकान के सामने LDA का पार्क है जिसमे एक नीम का पेड़ है और उस पेड़ पर बगल में रहने वाली एक नकचढ़ी बुढ़िया का एकाधिकार है। उस पेड़ से कुछ दूरी पर ही कदंब पेड़ है जिसकी enquiry अभी हम कर नहीं पाए हैं।

पार्क के दूसरे छोर पर एक मंदिर है जिसमे हर शनिवार और मंगलवार की शाम 6 बजे से 8 बजे तक मोहल्ले और  पास पड़ोस की महिलाएं कीर्तन करती है और सुबह आपस मे गली गलोच भी कर लेती हैं। माँ कहती हैं मोहल्ले वालों में आपस मे एकता बहुत है पर हमें ऐसा नही लगता।

मोहल्ले में 5-6 कुत्ते हैं टाइगर, चीकू, बघीरा, डोडो और दो अनजान कुत्ते हैं, बेहद शांत और एक है हमारी प्यारी बसंती। चीकू की एक टांग बचपन से खराब है पर उसकी वफादारी और daring गजब की है। टाइगर थोड़ा चिल्बिल्ला है, मोहल्ले का गबरू है आस पास की गलियों में उसकी धाक है, बाकी कुत्ते उससे थोड़ा दबते है पर वो बसंती से थोड़ा दबता है। बघीरा थोड़ा डरपोक किस्म का है पर पिछले कुछ दिनों से बसंती का बचा हुआ खाना खा खा कर कुछ तंदरुस्त हुआ है। और अब कॉन्फिडेंस से लबरेज रहता है।

ये सारे गली के ही देसी कुत्ते हैं पर मजाल है कोई बाहरी परिंदा मोहल्ले में पर मार जाए। 

हमारे घर के सामने वाले पार्क में रात में लगभग 15-20 गाड़ियां खड़ी होती है। पार्क कम कार पार्किंग ज्यादा लगता है। मोहल्ले में दो परिवार मुस्लिमो भाइयो के हैं, दोनों में बंटवारा हो चुका है। हमारे घर से दाईं ओर तकरीबन पैंतालीस डिग्री पर एक लाल रंग का मकान है जो लगभग खण्डहर हो चुका है और लखनऊ रेजीडेंसी की किसी टूटी इमारत का हिस्सा लगता है। पर उस घर मे बाकायदा एयर कंडिशनर लगा है, उसी घर के बच्चों ने चीकू और डोडो को पाल, दोनों ही कुत्तों को खुजली रोग है, पर पिछले कुछ दिनों से डोडो की हालत में सुधार है, डोडो लगभग 7-8 महीने की कुतिया है अजर चीकू लगभग 1 साल का कुत्ता है। अक्सर ये दोनों बच्चे डोडो और चीकू को टहलाने निकलते हैं, बच्चे अभी छोटे है तो उनको इतनी समझ नहीं है अक्सर डोडो और चीकू उन बच्चो द्वारा मोहल्ले भर में घसीटे जाते है और अक्सर उनकी पटखनी लगती रहती है। शायद उन बच्चों की माँ नहीं है या शायद मैंने आजतक उन्हें देखा नही। हमारे घर के बगल वाला घर हमारी ही जाती के किसी महाशय का है पर तमाम दिनों से खाली पड़ा है, सुनते है पहले यह ब्वॉयज़ हॉस्टल हुआ करता था, पर अब मालिक इसे बेंच कर दिल्ली में रहना चाहते हैं।

मोहल्ले की गली में घुसते ही  पहला मकान एक अधेड़ उम्र की औरत का है, उसकी आवाज कुछ भर्राई हुई सी है, आगे के दो दांत आधे आधे टूटे से हैं, रंग दबा हुआ है और चेहरे पर कुछ दाग हैं। अक्सर मैक्सी और एक लाल दुप्पटा गले में लपेटे अपनी बालकॉनी और मोहल्ले की दूसरी औरतों के साथ बैठा करती है। उसका एक लड़का है डील डौल शरीर है छोटे भीम वाले कालिया जैसा  हाँ वो बिल्कुल वैसा ही दिखता है, उसकी उम्र लगभग 16-17 बरस होगी और अक्सर अपनी लाल कमीज में मोहल्ले के दूसरे लड़को संग घर घर के चबूतरे पर pubg खेला करता है, उसकी माँ उसपर अपनी भर्राई आवाज में चिल्लाया करती है।

हमारे घर से बाईं ओर जुड़े हुए घर मे एक परिवार रहता है, वे ज्यादा किसी से मतलब नहीं रखते यहां तक इतना बता पाना भी कठिन है कि उस परिवार में कुल सदस्य कितने हैं। हां पर अंकल अक्सर अपनी छाती पर छेद वाली बनियाइन में अपनी छत पर टहलते नज़र आते हैं और बड़ी चतुरता से सड़क पर आने जाने वालों पर नजर रखते हैं।

हमारे घर के दरवाजे से साठ डिग्री बाएं ओर एक और घर है, जिनकी दो गाड़ियां सामने वाले पार्क में खड़ी होती है, स्विफ्ट डिजायर और वेगनआर। दो भाई है दोनों ड्राइवर हैं। ये वही घर है जिसमे पांच फुट की एक बेशरमा के पेड़ से भी दुबली पतली कुरूप औरत रहती है उसी का पार्क में लगे नीम के पेड़ पर एकाधिकार है। बुढ़िया  के एक पोता है एक पोती, पोता अक्सर कम दिखाई पड़ता है। पोती अपनी दादी की पक्की चेली है, अपने घर की बालकनी में खड़े होकर मोहल्ले में होने वाले सारे क्रिया कलाप वो दादी को आंखों देखी सुनाती है और कहीं कोई उसकी गाड़ियों के पास फटक भर जाए दादी को चिल्ला चिल्ला कर खबर हो जाती है और दादी अपना सारा काम छोड़कर बस भागी भागी सड़क तक देखने चली आती हैं। पोती की उम्र लगभग 11-12 साल है, नाम मुझे नहीं पता पर हाँ उस सामने लाल वाले घर मे रहने वाले लड़के संग उसकी खूब बनती है, दोनों दिनभर खूब खेला करते हैं। वो लड़का इसको खुश करने को जो बन पड़ता है करता है। कभी पहिये वाले जूते पहन कर सड़क पर भागा फिरता है तो कभी अपनी नन्ही साइकल पर करतब दिखाता है। लड़की भी उसके साथ खेलने को खूब उतावली रहती है।

पार्क के दूसरे कोने में दो पतंग बाज लौंडे रहते हैं और उस घर के नीचे एक सब्जी वाला, सब्जी वाले कि औरत और उसकी 2 जवान बेटियां रहती हैं। दोनों की उम्र लगभग 23-24 साल है...

Saturday, 3 July 2021

ये वादा रहा

आज सुबह अचानक मन मे ख्याल आया कि चलो कुछ लिखा जाए, मन तमाम दिनों से अनगिनत तरंगे उठ रही थी पर वो उस शिखर को नहीं चूम पा रही थी जहां से हम लिखना शूरू कर पाते।

लिखने के लिए कभी कभी आपको एकांत तो कभी ऐसे शोर की आवश्यकता होती है जहाँ आप खुदको भी न सुन सकें।

खैर.. आज हम अपने घर की प्यारी सदस्या बसंती जी को सुबह की सैर करा कर आ रहे थे, मन में कुछ कुलबुलाहट हुई और कुल्ला करते करते हमने सोचा कि लिखा जाए, पर लिखा क्या जाए ये भी सोचा, फिर एक आईडिया आया कि चलो जिस नए नए मोहल्ले में हम रहने आएं है उस पर कुछ लिखा जाए। पर लिखने के लिए और आप सभी को सब ठीक ठीक समझ आये उसके लिए थोड़ा कॉन्टेक्स्ट से रूबरू कराना जरूरी था, देखिए जैसे आपको पता नहीं था कि हम नए मोहल्ले में रहने आये हैं। हमने अपने परिवार में एक नई सदस्या को जोड़ लिया है जिसका नाम बसंती है और वो डॉगी परिवार की फीमेल वर्जन हैं। और साथ ही अपने परिवार की मजबूत स्तम्भ को दो महीने पहले खो भी दिया है... हमारे पिताजी।

जिंदगी चल रही है पर कुछ तो बदरंग है अब कोई बैंक तक दौड़ाने वाला नही है, रेडियो के सेल लेने भेजने वाला कोई नहीं है, घर मे सिर्फ अब 4 थालियां लगती हैं। 

आप सोच रहें होंगे के अपने पिताजी की बातें हम 4 लाइनों में निपटा रहे हैं। सही सोच रहें हैं। एक 22 साल के जवान लड़के के पिताजी के न होने का एहसास हम आपको नहीं कराना चाहते वरना प्रकृति के इस अन्याय को भेदने के लिए शब्दों के ज़हर में पिरोए अनगिनत बाण तरकश में भरें बैठें। लिखने बैठे तो शायद पन्नो पर स्याही से ज्यादा आंसू होंगे पर अब तक दो महीनों में नही रोए, आंसू जहां है उनको वही सुखा दिया है। इन चंद पंक्तियों के पीछे कितना बड़ा संसार छिपा है बस इसकी खबर हमारी कलम को है। 

अपनी डायरी में हमने अभी एक पन्ना और लिखा था पर उसका जिक्र अब नहीं करेंगे।

ख़ैर, हम भी कहाँ लेकर बैठ गए आपको, आपसे वादा करते हैं कि जी तोड़ प्रयत्न करेंगे और आपको कुछ न कुछ जरूर पढ़ाएंगे, ये वादा रहा।

Saturday, 27 February 2021

6 बजकर 15 मिनट वाली गाड़ी PART- 2

 
हमको 'एतना' तेज़ गुस्सा आया कि क्या कहें फिर क्या था हम हमारा पिट्ठू झोला और खाली ट्राली बैग लेकर भगे प्लेटफार्म नंबर 3 पर जाते जाते 3-4 लोगो से मुठभेड़ भी हुए पर सॉरी का गोंद लगा कर भागते रहे, आपको लग रहा होगा अब तो ट्रैन मिल ही जाएगी पर आप शायद भूल रहें हैं कि आजकल ज़िन्दगी हिंदी और अंग्रेजी दोनों का सफर करा रही है।

और अब आगे...

जैसे ही उतरे प्लेटफार्म नंबर 3 पर एक नई जंग शुरू हुई अब जंग थी अपना डब्बा ढूढ़ने की हमने दो लोगो से पूछा कि साहब ये D4 कहाँ मिलेगा किसी को खबर नहीं थी। हमने अपनी तेज़ नजर घुमाई और हमे कही दूर D2 चमकता दिखाई दिया, हमने अपने वन प्लस सेवन टी में समय देखा और समय हो रहा था 6 बजकर 13 मिनट हमने सोचा अब तो कौन ही रोकेगा अपनी गाड़ी में बैठने से अपने डिब्बे की ओर भागते हुए हमने कम से कम 4-5 दफा अपनी सीट का नंबर कन्फर्म किया और चढ़ गए अपने डिब्बे में, सारा डिब्बा खाली था हमने चौड़ में अपना ट्रॉली बैग अपनी सीट के नीचे धकेला और पिट्ठू बैग सीट पर फेंका और बैठ गए विंडो सीट पर, मस्त मुस्कान तैर रही थी मुखड़े पर और समय देखा तो स्क्रीन में 6 बजकर 14 मिनट चमक रहे थे, अचानक से एक epiphiny हुई अजी मेरा मतलब अचानक से एक एहसास हुआ मन किआ की ज़रा चेक करें कि डब्बा कौनसा है कॉन्फिडेंस इतना था कि बैग गाड़ी में ही छोड़ दिया और उतर गए डब्बा नंबर चेक करने, भाग कर देखा तो डब्बा मुस्काते हुए D3 चमचमा रहा था। हमने मन ही मन कहा हाय रे मोरी मैया! फिर भगे अपनी चौड़ वाली सीट पर, उठाया बैग और भगे D4 की तलाश में समय हो चला था 6 बजकर 15 मिनट और हमारा माथा टनक रहा था, तभी हमारी रेल गाड़ी ने बांग दे दी फिर भी हम भागते रहे पहले एस1 आया फिर एस2 फिर 3 करते करते एस8 तक पहुँच गए पर D4 नहीं आया फिर आगे बढ़े तो ऐसी वाले डब्बे चमक रहे थे और हमारी गाड़ी का दूसरा हार्न बज चुका था। ऑलमोस्ट उम्मीद खोते हुए हमने चार कदम और बढ़ाए की हमें थोड़ी दूर D4 चमकता दिखाई दिया हमने अपनी निन्जा रफ्तार बढ़ाई और चढ़ गए D4 में, बोगी में पहुँचे तो देखा एक भरा पूरा समूचा परिवार जिसमे तकरीबन 12 लोग थे ठुसे हुए थे और इस बार न विंडो सीट थी न aisle मन तो किआ दहाड़े मार कर रो दें पर जैसे तैसे खुद को उस भीड़ में सेट किया पर न जाने क्यों इस परिवार की 4-5 नन्ही बालिकाएँ हमें घूर रहीं थी और उनकी मातेश्वरी हमें खैर सबसे नजरें चुराई और सीट पर बैठने लगे फिर न जाने क्यों मन मे ख्याल आया कि एक दफा सीट नंबर औऱ चेक कर ले हमने अपना टिकट खोला डब्बा नंबर सीट नंबर यहां तक कि गाड़ी नंबर भी अपनी तसल्ली के लिए मिला लिया, खैर ऊपरवाले की दुआ से इस बार सब सही था। शायद पिछली बार D-4-33 होने की वजह से सब खिचड़ी होगया था और हम D-3- 33 में जा बैठे थे। अभी अपनी सीट पर बैठ भी नही पाए थे कि हमारी गाड़ी चल दी समय हो रहा था 6बजकर 17 मिनट। गाड़ी चली ही थी कुछ पांच सौ मीटर पर जाकर दोबारा रुक गयी, अब आपको तो पता ही है कि हम कितने ज्यादा ऑब्ज़र्वेन्ट इंसान हैं चूंकि हमारी सीट डब्बे के दरवाजे के बगल थी तो जैसे ही ट्रेन रुकी हमने देखा एक 23-24 साल का सांवला नवयुवक आंखों में गहरा काला सुरमा लगाए और सर पर काला गोटेदार साफा पहने दरवाजे से लटक रहा था और जैसे ही गाड़ी रुकी वो उतर गया और जाकर बगल से गुजरती पटरी पर जाकर बैठ गया कुछ सेकेंड गाड़ी रुकी और फिर हार्न देकर चल दी गाड़ी ने हौले से झटका लिया और पटरी पर सरकने लगी वो युवक वहीं बैठा रहा गाड़ी ने थोड़ी रफ्तार ली तब भी वह वही बैठा रहा फिर जब गाड़ी ज़रा तेज़ होने लगी वह भगा और चढ़ गया। तब मन मे एक एहसास आया कि शायद यह हम भारतीयों की प्रकृति में है या शायद ये फैशन में है कि अगर गाड़ी रुकी है तो अपने डब्बे से उतारना एक रिचुअल है जिसको निभाना अति आवश्यक। खैर आपको बस ये रिचुअल वाली बात ही बतानी थी बाकी तो यों ही हमने बक बक कर ली और आपको लम्बी सी कहानी सुना दी। आपने हमारी कहानी सुनी इसके लिए धन्यवाद ऐसे ही प्यार देते रहिये और बताइएगा जरूर कैसा लगा।

Thursday, 25 February 2021

6 बजकर 15 मिनट वाली गाड़ी PART-1

 सफर चाहे हिंदी वाला हो या अंग्रेजी वाला दोनों के अपने अपने रंग है रूप हैं और अपने अपने अफ़साने। आजकल अपनी ज़िंदगी में दोनों ही सफर चल रहे हैं। सफर भी और suffer भी। पिछले लगभग 1 साल से गायब होने के लिए सॉरी। जिनको नहीं पता है उनको बात दें कि आजकल हम हमारा झोला उठाए और एक 6x10 की खोली में अपने 3 बिज़नेस पार्टनर  के साथ जमीन पर देहरादून में सो रहें हैं। बिजनेस क्या है वो कभी और बताएंगे। तो योंही किसी काम से पिछले दिनों घर वापसी यानी कि लखनऊ जाने का सौभाग्य मिला। जैसे ही जाने का प्लान बना हमने झट से आई आर सी टी सी की वेबसाइट खोली और लगे ट्रेन तलाशने फ़ोन स्क्रॉल करते करते अचानक नज़र रुकी तो एक ट्रेन में 190रुपये 5 पैसे का टिकट दिखा रहा था और ऊपर स्याह रंग से लिखा था 2 टू एस, थोड़े घोड़े दौड़ाए फिर समझ आया कि ये वही जनरल डब्बे हैं जिसमे पूरे पैसे देकर कभी अपनी जान पर जुआं खेल कर किसी तरह दरवाजे, ट्रेन के शौचालय या अपने पिछवाड़े के किसी कोने से किसी दूजे की सीट पर टिक कर जाया करते थे, पर इस बार covid भैया की कृपा से पूरा पैसा देकर पूरी सीट मिल रही थी। हमारे मुखड़े के कोने पर एक सुनहरी मुस्कान तैर गयी। हमने झट से टिकट खरीदा और गूगल पे कर दिया। और खाते से जी एस टी समेत पूरे 201 रुपये 80 पैसे कट गए और साथ कि स्क्रीन पर एक टन्न से एक मैसेज और चमका जिसमे लिखा था Rs. 300 हैस बीन दिडक्टेड फ्रॉम योर एकाउंट बैलेंस xxxx. ताबड़तोड़ हृदयगति रुकी फिर मालूम हुआ कि मिनिमम बैलेंस मेन्टेन न करने के कारण ये फटका लगा है। अब क्या कर सकते थे। शाम के 18:15 मिनट वाली गाड़ी के टिकट पर अपने नाम की मोहर लगाई और चादर तानी और सो गए। 

दुनिया मे तमाम लोगो की तरह हम भी 2 स्टार्ट अप का हिस्सा हैं और जी जान लगा कर काम कर रहें हैं। आफिस शिफ्ट हो रहा था तो दिन भर उसमे लगे रहे, शाम को जब 4 बजा तो होश आया कि आज तो लखनऊ निकलना है, आनन फानन में स्कूटी पर बैठे अपना झोला पैक किया और दो रोटी जैसे तैसे ठूस कर निकल पड़े, घड़ी में समय हो रहा था 5 बजकर 32 मिनट कुछ 4 किलोमीटर आए होंगे कि स्कूटी अचानक से लहराने लगी जरा रोक कर देखा तो पीछे वाला टायर हंस रहा था उसने हमको देखा हमने उसको और मानो वो कह रहा हो और मियां बड़ी जल्दी में भाग रहे थे आओ तनिक सुस्ता लो, हमारा मन तो कलप गया पर करते भी तो क्या। हमारे हेमंत भैया जो गाड़ी चला रहे थे उन्होंने हमको देखा हमने उनको उनके चेहरे पर कुछ तो निराशा के भाव थे कुछ डर के, शायद डर इस बात का की हमारी गाड़ी न छूट जाए। उन्होंने फट से शाहरुख मंसूरी भाई को फ़ोन लगाया और उनकी एक्टिवा गाड़ी मंगा ली, फिर शुरू हुआ हेमंत दादा और हमारा अपनी किस्मत पर रोना थोड़ा वो रोए थोड़ा हम। खैर जैसे तैसे पहुचे देहरादून रेलवे स्टेशन और हमारी घड़ी में हो रहा था 6 बजकर 10 मिनट। अब इसे बुरी किस्मत कहें या मंद बुद्धि हमने आई आर सी टी सी से आए हुए टिकट को देख उसमे लिखा था P1-D4-33 जिसका अर्थ हुआ आपकी गाड़ी प्लेटफार्म नंबर एक पर आएगी जिसमे बोगी नंबर D4 में आपकी सीट नंबर 33, हम स्कूटी से उतरे और भागे ज़ोर से आओ देखा न ताओ चढ़ गए एसकेलेटर पर ऊपर पहुचे तो जान पड़ा यहां तो प्लेटफार्म नंबर 3 से सब शुरू है फिर नीचे भागे किसी तरह पूछा तो पता चला प्लेटफार्म नंबर 1 का रास्ता नीचे से है। जैसे कि प्लेटफार्म नंबर एक पर पहुचे वहां 2 गाड़ियां खड़ी थी अरे भाई एक गाड़ी प्लेटफार्म नंबर 1 पर और दूसरी 2 पर दोनों की लखनऊ के रास्ते होकर जाती थी पर हमारी गाड़ी का नंबर न जाने क्यों उन गाड़ियों के नंबर से मेल नहीं खा रहा था, तभी पीछे से एक देवी जी बोली '66 प्लेटफॉर्म नंबर 3 पर खड़ी हैं' हमने गौर किया तो ये वो रेलवे वाली जीजी थी जिन्होंने एक बार पुनः दोहराया attention please train number 04266 via haridwar, moradabad bareilly to Lucknow is standing on platform number 3. हमको 'एतना' तेज़ गुस्सा आया कि क्या कहें फिर क्या था हम हमारा पिट्ठू झोला और खाली ट्राली बैग लेकर भगे प्लेटफार्म नंबर 3 पर जाते जाते 3-4 लोगो से मुठभेड़ भी हुए पर सॉरी का गोंद लगा कर भागते रहे, आपको लग रहा होगा अब तो ट्रैन मिल ही जाएगी पर आप शायद भूल रहें हैं कि आजकल ज़िन्दगी हिंदी और अंग्रेजी दोनों का सफर करा रही है...


जुड़े रहिये अभी कहानी खत्म नहीं हुई है एक भाग और आना बाकी है, आइयेगा जरूर। पिंकी प्रॉमिस?


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