आज अगर इंसान की बुनियादी जरूरत देखे तो वो है रोटी, कपड़ा, और मकान। इंसान एक बार को रोटी मांग कर खा लेगा कपड़े फटे पुराने मांगे पहन लेगा पर सर छुपाने के लिए मकान तो चाहिए उसका क्या? आज भारत के आज़ाद होने के 70 साल बाद भी देश मे न जाने ऐसे कितने वर्ग है जिनके पास रहने के लिए छत नही है, वो सड़क किनारे झुग्गी झोपड़ियों में रहना तो दूर पॉलीथिन के टेन्ट लगा कर अपना जीवन यापन करने पर मजबूर हैं। ऐसा ही कुछ मंजर उत्तराखंड के हरिद्वार शहर के तमाम इलाकों का है। आंकड़ो की माने तो हरिद्वार में 47 मलिन बस्तियां है जिनमें से 12 सरकारी जमीन पर बनी हुई है। यहाँ पर रहने वाले लोग पॉलीथीन के बनाए हुए टेंट या यूं कहें कि झोपड़ियों में रहने को मजबूर है, और कुछ तो गरीबों के हवा महल जैसे प्रतीत होते हैं फर्क सिर्फ इतना है कि ये महल माचिस के डिब्बे से थोड़े बड़े है और महल में खुली जगह का अभाव बिल्कुल नहीं है। हरिद्वार में श्रद्धा की कमी नहीं है पर मानवता की कमी हमे पूरी तरह से हर की पौड़ी के घाट पर देखने को मिलती है। इस काँवर के मेले में न जाने कितने श्रद्दालु की भीड़ वहां जमा है हाईवे और घाट के बीच वाले छेत्र में, इन मलिन बस्तियों में न जाने कितने ही ऐसे परिवार है जो भीख मांग कर गुज़ारा करते है और लोगो की श्रद्धा का 'फायदा' उठा कर अपना पेट पाल रहे हैं। इस डाक काँवर मेले की अगर सुरक्षा की बात की जाए तो लगभग 1 किलोमीटर में दायरे में फैली इस बस्ती में मात्र 2 घुड़सवार जवान लगाए गए हैं, बाकी की सुरक्षा शायद इसलिए नही है क्योंकि ये हरिद्वार है। इस भीड़ में कौन कितनी श्रद्धा और कितने नेक इरादे से से आया है इसका ईश्वर ही मालिक है। और अगर मान भी ले कि सुरक्षा की दृष्टि से सब ठीक रहेगा तो सबसे पहला सवाल यह उठता है कि ये बस्ती यहां है क्यों, सरकार क्या कर रही है, इनके सर की छत कहाँ है? क्या ये लोग सरकार को बस चलते फिरते वोट नज़र आते है? इनके प्रति संवैधानिक कर्त्तव्यों को शायद ऊंचे पदों पर बैठे राजनेताओं ने लगता है काँवर मेले में पोटली बना कर गंगा में बहा दी है। अगर बात करे योजनाओं की तो कभी कभी ऐसा लगता है हमारा देश हमारा काम योजनाओं का ज्यादा है। कांग्रेस के शाशन में कांग्रेस कीे 'मलिन बस्ती पुनर्वास नीति' 2016 में आई थी पर उसके बाद भाजपा की सरकार आने के बाद यह योजना भी अन्य योजनाओं की तरह ठंडे बस्ते में बंद नज़र आ रही है और न ही भाजपा सरकार इनके लिए कोई योजना बनाती नज़र आ रही है। वाल्मीकि बस्ती,तिबड़ी ब्रह्मपुरी, हरिद्वार छेत्र राजीव नगर वाल्मीकि बस्ती, मायापुर ऐसी न जाने कितनी ही बस्तियां है जो अवैध है और अपनी बहाली के इंतजार कर रही है। सरकार ने इनका विभाजन 3 श्रेणियों में किआ है जिनपर यह दर्शाया है कि 'ए' श्रेणि वालो को बिजली, पानी आदि मिलेगा वह भी बस कागजों पर ही है। पेयजल, सीवर, स्वछता, विद्युत, सड़क इत्यादि के प्रबंध के बारे में श्वेत कागजों पर लिखा तो बड़ा सुंदर सुंदर गया है पर ये सब सरकारी दफ्तरों की फाइलों में पड़ा धूल खा रहा है। अब इंतेज़ार है तो ये की सरकार कब चेतेगी या शायद किसी अनहोनी के इंतेज़ार में बैठी है और अगर कुछ ऊंच नीच होगयी तो सरकार एक्शन लेगी, मुआवजा देगी वरना काम तो चल ही रहा है।
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