आज 26/11 के दिन करीब एक दशक पहले बम्बई में जो आतंकी हमला हुआ उसमें न जाने कितने ही भारत माँ के वीर सपूतों ने अपना बलिदान दिया, चाहे वह भारत माँ का बेटा एक सैनिक हो या चाय वाला या स्टेशन मास्टर या फिर कोई पुलिस का जवान ही क्यों न हो। सबने इस घटना पर शोक तो मनाया पर आज लगभग 10 साल बाद शायद ही किसी को याद होगा कि आज के दिन क्या हुआ था, अधिकांश अपनी अपनी ज़िंदगी मे व्यस्त हैं, सबसे ज्यादा खेद तो तब होता है जब संदीप उन्नीकृष्णन, विजय सालस्कर,विनोद कमले जैसे वीर सपूतो के देश का युवा सो रहा है, उसे अपने फेसबुक , व्हाट्सएप्प के स्टेटस अपडेट करना तो याद है, पर यह याद नहीं कि आज के दिन न जाने कितने भारत माँ के बेटों ने उपना बलिदान बिना एक पल सोचें दिया था। क्या सोचा किसी ने एक बार भी की बस आज के लिए आज के ही दिन उन वीरों को याद कर लें। शायद नहीं हम क्यों करें उनका काम था शहीद होने वो होगये उनकी यही तो ड्यूटी थी हमें इससे क्या मतलब। बात शहीदों की आई है तो एक बात और बताता चलता हूं , फौजी की ज़िंदगी शहीद होने के लिए नहीं होती उसे जीने का पूरा अधिकार है, पर हम यह मान कर बैठे है कि फौजी है शहीद ही होगा। खैर आपको इससे क्या जाने दीजिए। अजी हमारा काम तो 15अगस्त और 26जनवरी के दिन तिरंगा फहरा कर और बड़ी बड़ी बातें कर के खत्म हो जाता है, इससे ज्यादा हम कर भी क्या सकते है, और करे क्यों हमने ठेका थोड़ी ले रखा है, लगे रहने दो लोगों को। कभी मौका मिला तो किसी दिन फेसबुक पर होशियारी दिखा देंगे या किसी पोस्ट को शेयर कर देंगे बहुत है उतना। लेकिन नहीं उससे नहीं बन जाते आप देशभक्त और ये कर के अगर आप अपने आपको देशभक्त कहते है तो देसभक्त शब्द का अपमान कर रहे है आप।
मैंने अपने एक साथी से पूछा आज क्या है? जवाब सुनकर दंग रह था मैं उसने मुझे बताया कि आज के दिन मैंने पिछले साल अपना नया आईफोन लिया था, उसे तो यह भी याद नहीं या शायद पता ही नहीं कि आज 26/11 के दिन कौन आया था क्या कर गया क्या हुआ?
लगभग एक दशक पहले 10 नमूनें आए थे भारत और तबाही मचा दी। बम्बई- न सोने वाले शहर को कुछ घंटों में मौन कर दिया पर याद है किसी को? करना क्या है याद कर के ? सवाल तोह जायज है कि याद कर भी लिए तो क्या? जवाब में कहूंगा याद करने से फर्क नहीं पड़ता महसूस करने से पड़ता है,जरूरी नहीं फौज में रहकर सेवा करें जरूरी यह है कि करें और पूरे जोश और जज्बे से करें। स्टेशन ,चाय की दुकानों पर काम करने वाले फेरीवाले ये सब फौज में तो नहीं थे,पर वे इस परिस्थिति सर लड़े, उन्होंने हर संभव मदद की। मैं यह नहीं कह रहा कि आप सारी दुर्घटनाएं याद रखें पर आप जिस देश के लाल हैं उसका गौरव आपमें हो। मैं यह लिख कर सिर्फ यह बताना चाहता हु की हर नागरिक अपनी अपनी एहमियत रखता है, कोई काम नहीं कोई ज्यादा नहीं।
बाकी मैं आप पर छोड़ता हूँ।
जीवेश नंदन।
मैंने अपने एक साथी से पूछा आज क्या है? जवाब सुनकर दंग रह था मैं उसने मुझे बताया कि आज के दिन मैंने पिछले साल अपना नया आईफोन लिया था, उसे तो यह भी याद नहीं या शायद पता ही नहीं कि आज 26/11 के दिन कौन आया था क्या कर गया क्या हुआ?
लगभग एक दशक पहले 10 नमूनें आए थे भारत और तबाही मचा दी। बम्बई- न सोने वाले शहर को कुछ घंटों में मौन कर दिया पर याद है किसी को? करना क्या है याद कर के ? सवाल तोह जायज है कि याद कर भी लिए तो क्या? जवाब में कहूंगा याद करने से फर्क नहीं पड़ता महसूस करने से पड़ता है,जरूरी नहीं फौज में रहकर सेवा करें जरूरी यह है कि करें और पूरे जोश और जज्बे से करें। स्टेशन ,चाय की दुकानों पर काम करने वाले फेरीवाले ये सब फौज में तो नहीं थे,पर वे इस परिस्थिति सर लड़े, उन्होंने हर संभव मदद की। मैं यह नहीं कह रहा कि आप सारी दुर्घटनाएं याद रखें पर आप जिस देश के लाल हैं उसका गौरव आपमें हो। मैं यह लिख कर सिर्फ यह बताना चाहता हु की हर नागरिक अपनी अपनी एहमियत रखता है, कोई काम नहीं कोई ज्यादा नहीं।
बाकी मैं आप पर छोड़ता हूँ।
जीवेश नंदन।