"गंगा जी गंगा जी है चाहे उम्मा कुछू परा होए, नहेबा तो हुऐं।"
तोतिया रंग की बुशर्ट और गले मे भगवा गमछा डाले एक अधेड़ उम्र के आदमी से अपनी बात पर दृढ़ता दिखाते हुए कहा।
हम आज देहरादून से हरिद्वार जा रहे थे और पूरी बस में नवरत्न तेल से महक रही थी। यह सर दर्द मिटाने वाला तेल हमारे सर दर्द का कारण बनता जा रहा था।
मुश्किल से 35 सवारी वाली बस में 20 से अधिक सैलानी ऐसे थे तो हरिद्वार में गंगा स्नान के लिए जा रहे थे, उनकी बातों से लग रहा था शायद एक परिवार या एक ही गांव/मोहल्ले के रहे होंगे, कुछ नवविवाहित युगल थे कुछ अधेड़ उम्र की औरत और आदमी और कुछ नन्हे बच्चे।
और आखिरी की सीटों पर कुछ कालेज जाने वाले विद्यार्थी जो खिड़की पर बैठ कर हवा का आनंद ले रहे थे।
हम अधूरे मन से आज वापस लखनऊ जा रहे थे। अधूरा इसीलिए क्योंकि हमारा दिल पहाडों में बेहद अच्छे से लगता है, और वापस यूँ जाना था कि अपना काम संभालना था। स्टूडियो में न होने के कारण हमारे कई ग्राहक ठीक से सामान नही ले जा पा रहे थे। हम लखनऊ में रहकर फ़िल्ममेकिंग के अलावा अपनी एक टी-शॉर्ट छापने की कंपनी चलाते हैं। जिसे शायद हमारी माता जी काम नहीं समझती, उन्हें लगता है हमे सरकारी नौकरी कर लेनी चाहिए। खैर हमारा नौकरी में कभी दिल लगा नही और न हम ऐसे थे कि चंद पैसों की खातिर खुद पर किसी को हुकूमत करने देते। और ज़िन्दगी के कुछ सपने आपके तभी पूरे होते है जब आप आर्थिक रूप से अति सम्पन्न हों। हमारा हमेशा से मानना रहा है कि नौकरी से इंसान अपनी जरूरतें तो पूरी कर सकता है मगर ख्वाब नही, कला के प्रति मेरा रुझान सदा से रहा है खासकर फिल्ममेकिंग और लेखन।
खैर हमारा यह व्यवसाय ठीक चल रहा है, घर -खानदान में किसी को व्यवसाय की ज्यादा परख नहीं है तो अधिकांश चीजें हम खुद ही सीख रहें हैं, जाहिर है जिससे ढेरों गलतियां होती है। पर अब हमे लगने लगा है कि हम सीख रहे हैं। और दिन प्रतिदिन बेहतर हो रहें हैं।
तो बस अपने इसी सपने की खातिर हम अपनी दूसरी इच्छाओं को दबाकर वापस लखनऊ जा रहें हैं।
हमारा स्नातक के समय से ही देहरादून से गहरा नाता रहा है, यह शहर हमारे लिए खास रहा है। अक्सर अपने कॉलेज के दिनों हमारा दोस्तो के साथ , कालेज ट्रिप पर यहां खूब आना हुआ है।
इस शहर से हमारा इतना लगाव रहा है कि हम कुछ वर्ष पहले एकदम न्यूनतम वेतन में भी यहां की एक कंपनी में काम करने लगे थे।
फिर कुछ कारणवश हमें लौटना पड़ा।
इस शहर को हर मर्तबा अलविदा कहने के बाद ऐसा लगता है हमारा कुछ हिस्सा वही रह जाया करता है।
अब हम लौट रहे थे तो सोचा अपने वविश्वविद्यालय हो लूं। तो बस उसी सिलसिले में हम हरिद्वार के लिए बढ़ निकले।
देहरादून से लौटने का शोक मैं मना ही रहा था कि मेरे बगल में बैठी अधेड़ उम्र की महिला ने अपने पीले फूल वाले ब्लॉउज़ से तंबाखू निकली और ज़ोर से खिड़की की तरफ पीट दी, और अपने होंठ तले तंबाकू दबा ली। जिसके बाद हमारी नाक में तमाम समय तक सुगबुगाहट होती रही।
हमने उस औरत को गौर से देखा, उसने गाढ़े पीले रंग की साड़ी पहनी थी जिसपे काले रंग के चौखटे में लाल रंग के फूल उसकी पूरी साड़ी में बने थे, उसके हाथ पर तमाम चित्रकारी थी, जैसे भैयादूज में हमारे घर के आंगनों में पाई जाती है। उसके हाथ की पूरी चित्रकारी तो खैर मैं नहीं देख सका क्योंकि उसने दोनों हाथों में लाल रंग की 6-6 चूड़ियां पहनी हुई थी। हम उसको गौर से देख रहे थे, उसने कुछ असहज होकर अपने पल्लू अपने सर पर रख लिया, यह देख हम भी कुछ असहज होगए और हमारा ध्यान टूट गया।
हमने देखा हमारे आगे वाली सीट पर एक नवदम्पति बैठा था, शायद नव दम्पति ही होगा क्योंकि दोनों अपने स्मार्टफोन की टूटी स्क्रीन में सेल्फियां ले रहे थे और एक दूसरे को देख कर उनकी आंखें चमक रही थीं। दोनों में लड़की की उम्र बमुश्किल 20 वर्ष रही होगी, उसने लाल रंग की सफेद गोटे वाली सारी पहनी हुई थी, कान में सोने के चैन वाले झुमके बार बार उसके घुंगराले बालों में अड़ रहे थे, उसके हाथों में हरे रंग की ढेरों चूड़ियाँ थी और गोद मे 2 साल का बच्चा जिसे शायद वह अभी अभी दूध पिला कर फ़रिख हुई थी। उसके आंखों में मोटा सूरमा था गाल और होंठ के ऊपर काले मस्से, गले मे नारंगी मोतीयों में पिरोया हुआ मंगलसूत्र। होंठो पर गहरी लाल लाली। चेहरे पर मासूमियत उसे आकर्षक बना रही थी। और वह अचानक आए फ़ोन पर किसी को डांट रही थी। इतने में हमारी नज़र उसके पति पर गयी, बैंगनी रंग की बुशर्ट, मुह में मसाला लिए वह मुस्कुरा रहा था।
हमारे पीछे की सीट पर दो औरतें आपस मे बिना ब्रेक कर बातें करें जा रही थीं। दोनों सुहागन थी, दोनों के साजो-श्रृंगार से बताया जा सकता था। बस में भीड़ बढ़ चुकी थी, नवरत्न तेल की गंध मद्धम पड़ चुकी थी पर बस में बैठे लोगों की शरीर की दुर्गन्ध बस की खिड़की की हवा से होते हुए हमारी नाक को भेदे चली जा रही थी। हम अपनी अधूरी सांसो से मैदान में डटा हुए थे।
हमारा ध्यान बार बार सामने की सीट पर बैठी लाल साड़ी वाली विवाहित पर जा रही थी, कभी कभी पीछे से शोर होने पर वो भी पीछे पलट कर देख लेती थी। हमे उसकी लाल झीनी साड़ी से उसके झुमके और गले मे पड़ा मंगलसूत्र दिख रहा था। हम उसे देख कर बस यह अनुमान लगाना चाहते थे कि उसका वैवाहिक जीवन कैसा होगा? महज 20-22 साल की लड़की, एक 2 साल के बच्चे के साथ कैसे जीवन यापन करती होगी। क्या इसकी ज़िन्दगी में भी अपने पति से आजकल के शहरी दम्पती की तरह लड़ाइयां होती होंगी? या ये बस 2 मीठे बोल, घर का काम धाम, साजो श्रृंगार में खुश रहती होगी? या फिर ये दोनों लड़ते होंगे कि मुझे प्राइवेसी चाहिए, और क्या ये एक दूसरे से ईमानदार होंगे? क्या इसका पति इसे सच मे प्रेम करता होगा? क्या दोनों के यौन संबंधों में मधुरता होगी? या तमाम औरतों की तरह यह भी जो मिल गया उसमे खुश रहती होगी?
ऐसे तमाम सवाल हम सोच रहे थे तब तक कंडक्टर बोला हरिद्वार- हरिद्वार, हरिद्वार वाले आ जाओ भाई।
हमने उस लड़की को एक बार देखा मन मे मुस्कुराया और अपना बस्ता उतार कर बस से उतर गया।