काफी समय होगया है, कहीं दूर गये हुए आखिर बार दिल्ली में ज़रा भटकने निकले थे जिसकी कहानी अभी आपने सुनी नहीं है, अरे अरे उतावले मत होइए वो भी सुना देंगे। उसके पहले सुनिए किस्सा पहाड़ो का। यों ही बैठे बैठे एक दिन मन में ख्याल आया की क्यों न कहीं की सैर कर ली जाए वक्त काफी होगया था कहीं भटके। बस मन में ख्याल आया और हमारा लखनऊ का खुराफाती दिमाग दौड़ पड़ा। तो भैया प्लान बना देहरादून के एक हवाईजहाज़ वाले बड़े रेस्तरां में खाना खाने का। अगले दिन सुबह उठे उसके बाद कभी नीली, कभी सफ़ेद, कभी काली, तो कभी नीली शर्ट आजमा ली, पर कुछ खास मज़ा नहीं आया। आखिर में जैसे तैसे मन को समझाया कि तुम डूड हो कुछ भी पहन लो। खैर आईने में खुद से तमाम जद्दोजिहद के बाद हमने विदा ली और पहुँचे हाईवे 58 पर। तमाम ऑटो वालों ने हमे जबरन ऋषिकेश छोड़ने की तमाम कोशिश कर डाली पर हम अपने इरादे की पक्के थे जाना तो देहरादून ही था। थोड़ी देर में एक नब्बे के दशक वाली किडनेपिंग गाडी आई और हमारे पास रुकी, हमने फटाफट से फिरौती की रकम के लिए अपने घर वालों का नंबर मन ने दोहरा ही रहे थे की अंदर से आवाज आई, हाँ भई देहरादून? इतना सुनते ही हम लपक लिए गाड़ी में, अंदर दो बच्चे उनकी माँ-बाप और दो और लोग बैठे थे। सबने हमको ऐसे देखा जैसे हमने उनके घर में किसी को छेड़ दिया हो, बुद्धि लगाई तो समझ में आया की 3 जन की सीट पर हम चौथे प्राणी आकर बैठ गए थे हमने उनकी नाराजगी समझी और घुस गए यू-टूब में। धक्के खाते खाते तकरीबन डेढ़ घंटे बाद हम पहुचे देहरादून की आई एस बी टी। यहाँ भी वही नज़ारा था सब हमें अपनी अपनी बसों और ऑटो में भरने लेने को उतावले थे। जान बचा कर एक कोने में आए और गूगल बाबा को याद किया उन्होंने हवाईजहाज़ वाले रेस्तरां का जैसे ही किराया बताया हमने तौबा कर ली, पर अब सवाल ये थे की भई आ तो गये अब सर मारा कहाँ जाए। तो हमने अपने एक दोस्त को फोनिया दिया, बड़ी मान मनोती के बाद वो माने वो भी आए तो बस 5 मिनट के लिए। अब हमको भूंख लग आई थी भैया हम ठहरे लखनऊ वाले अंजान शहर जाए और खाना न खाए ऐसा कैसे? खाया पिया और सोचा अब चलते हैं दिन तो बर्बाद हो ही चूका था। हमने भी बस वालों की ज़बरदस्ती मान ही ली बैठ गए वापस हरिद्वार की बस में, जैसे ही बस चली हमारे सामने वाली सीट पर एक 10 बरस का लड़का और एक लगभग 8 बरस की लड़की अपनी माता जी एक साथ आकर बैठ गए। फिर शुरू हुआ उनका तांडव। जब हम इतने बड़े घोड़े होकर ज्यादा देर बिना खुराफात के नहीं बैठ सकते तो वो कहाँ से बैठने वाले थे। हम कितने भी बड़े हो जाएं बसों में हमारी वाली खिड़की का शीशा जब तक ज्यादा न खुला हो ऐसे लगता है हमारे आत्म सम्मान पर किसी ने आघात किया हो, हममें और उन बच्चों में शुरू होगया खिड़की का जंग लगभग 5 मिनट तक खिड़की से पोसम पा करते रहे, तब तक हमने देखा माथे से नारंगी सिन्दूर भरे और काले होंठों पर मेहरून रंग की लिपस्टिक के साथ लगभग काले रंग की आउट लाइन बनाए उनकी माता श्री हमें आँखे तरेर के देख रहीं है, हमारी रूह कांप गयी पर ढीट तो हम हैं ही किसी तरह थोड़ा सा शीशा खुलवा ही लिया फिर उनका कार्यक्रम शुरू हुआ, कभी उठना कभी मचलना, मचल वो रहे थे और यातनाएं हमारे पैर सह रहे थे। करुणा भरी निगाहों से मैंने उनकी ओर देखा उस नामुराद लड़ने ने एक बुरी सी मुस्कराहट देते हुए ज़ोर का हमारे सफ़ेद जूतों पर मारा और उनका मुँह काला कर दिया। मरता क्या न करता उनको प्यार से समझाया। खैर थोड़ी देर तो शांति थी फिर निकला उनका कुरकुरे का पैकेट असली कहानी तो अभ शुरू होती है, बेरहमी से उस लड़के ने पैकेट फाड़ा और मेरी तरफ देखते हुए खिड़की से बाहर उड़ा दिया। मन में एक टीस उठी पर उनकी माता श्री की घूरती आँखों के डर से हमने अपने आपको को समझाया। हम इतना सोच ही रहे थे की उन्होंने अपना कुरकुरा खत्म कर के बचे हुए पैकेट को खिड़की से बाहर निकाला और उसमें हवा भरने लगे और ऐसे खुश हो रहे थे जैसे मानो की बॉलीवुड की कोई सुंदरी अपना दुपट्टा खिड़की से बाहर निकाल कर हवा में लहरा रही हो। हम अपनी हिम्मत जुटा ही रहे थे की ऐसा मत करो तब तक उन धूर्तों ने जबरदस्त झटके के साथ उस पैकेट को हवा में उड़ा दिया और नाच उठे। हमने उनकी माता श्री की तरफ देखा वो भी खुश नज़र आ रहीं थी अपने बच्चों की इस सफलता पर।
तभी मेरे दार्शनिक मन में एक ख्याल आया की हम बड़ी दुहाई देते हैं बच्चों की पढाई की क्या हमें कुछ ऐसे विद्यालयों की जरूरत नहीं की वो माँ बाप को पढ़ा सकें। वो बता सकें की बस बच्चों की डिग्री या क्लास में आए नंबर ही पर्याप्त नहीं है, सड़क की सफाई, बस की सफाई या कोई भी भी सामाजिक जिम्मेदारी भी जरुरी है। हर तीसरे दिन मैं देखता हूं कभी ऑटो में बसों में रेलवे स्टेशन पर बच्चे अपने माँ बाप के सामने तमाम कचरा करते रहते हैं और उनके माँ बाप चूं भी नहीं करते। जिस तादाद से मैंने यह देखा है मुझे लगता है हर बस्ती हर गली एक ऐसा स्कूल जरूर होना चाहिए।
नोट:- कृपया आदर्श माँ बाप अपने स्वाभिमान और आत्म सम्मान पर इस बात को जरूर ले।
धन्यवाद।
