सुन लो भैया एक और दास्तां, आ ही गये थे लखनऊ तो सोचा अपना दार्शनिक 'मोड' ऑन कर लें। तो हुआ ऐसा की हमे दिल वालों की दिल्ली में ज़रा कुछ काम आन पड़ा तो भई हमने सोचा क्यों न अपने शहर की हवा से भी मुलाक़ात कर लें। तो बस वही अपनी पुरानी साथी स्प्लेंडर उठाई और चल दिए सैर पर। शाम ढल चुकी थी, योगी जी के राज में तमाम गलियां और सड़के मुँह में गुटखा दबा चुकी थी चूँकि मौसम बारिश का था। हम भी ढीट ठहरे फंदा दिए अपनी स्प्लेंडर वहीँ पर, सड़कों ने हमे आँखे तरेर के देखा और बोली ख़बरदार जो दुबारा हमारा गुटखा ख़राब किये तो 1090 पर केस ठुकवा देंगें। हम भैया डरे क्योंकि ज़माना है 'वुमन एम्पावरमेंट' का और दुबक लिए एक कोने में। बचते बचाते जब हम मेन रोड पर पहुंचे तो पता चला यहाँ तो रेस खेल रहे थे सारे गाड़ी चालाने वाले। हमे सारी गाड़ियां एकदम राजनेताओं जैसी लग रही थी की बस किसको कैसे पछाड़ा जाए कहाँ से कट मारा जाए की हम आगे हो जाएं, कुछ भैया लोग तो ऐसा हार्न लगा कर गाड़ी सरपट दौड़ा रहे थे जैसे बाइक नही ट्रक लेकर चल रहे हों, तो वही किसी के हार्न से नागिन डांस की धुन निकल रही थी, वो धुन इतनी शानदार थी की हमारी स्प्लेंडर ने चलने से मना कर दिया बोली अब हम आगे बढ़ेंगे तो नाचने के बाद ही। बड़ी सर फुट्टवल के बाद वो मानी तब आगे बढ़े और हम भी बन गए उस रेस का हिस्सा। पर गाड़ी चलाते समय एक एहसास, एक ख्याल आया अब वो आप पढ़िए और हमे बताइये की भैया तुम सही हो या फिर अमा यार कुछ ढंग का काम किया करो। तो हुआ ऐसा जब हम अपनी तुन्तुनाई हुई स्पेलेंडर लेकर सड़क पर निकले जहाँ एक अजब गजब भीड़ थी और अगल बगल से शियूं शियूं से निकलती गाड़ियां थी ऐसा लग रहा था कि सबके पीछे स्कूल के पीटी वाले मास्टर साहब पड़े हैं, अगर भागोगे नहीं तो छड़ी पड़ेगी। पर एक अचंभा और भी था वो शियूं शियूं गाड़ी निकालने वाले सिर्फ नए जवान हुए लड़के ही नहीं थे वो भी थे जिनके मुँह तक पोपले हो चुके थे (यह पंक्ति इसलिए लिखी है ताकि हमारी जनरेशन के प्रति जजमेंटल न हुआ जाए की हम ही तेज़ गाडी चलाते हैं)। खैर उस भीड़ में सब खैरियत था न कहीं जाम था, न भगदड़ फिर भी लोग सड़क पर सांप सीढ़ी खेल रहे थे कोई इधर से घुस रहा था कोई उधर से कुछ लोग शायद मौत का कुआँ भी खेल रहे थे और हमे लग रहा था डर, अब आप सोचेंगे अभी तो ये ढीट था अब डर, तो अरे भई हम भी तो अपने घर वालो की ज्यादाद के अकेले वारिस थे न। हम भी आपको बहुत भटकाते हैं तो खैर ये खेल देख कर बड़ा अजीब सा एक ख्याल आया हमे लगा ये जो सड़कों पर जबर्दस्ती की जल्दी है, एक दूसरे को पछाड़ने की होड़ है, कैसे भी करके नियम तोड़ कर आगे बढ़ने की जो जहमत है कहीं ये असल जिंदगी की हार को छुपाने का तरीका तो नहीं? हम ज़िन्दगी में तमाम मोड़ पर हार जाते हैं, टूट जाते हैं, पर हमारा बस वहां नहीं चलता तो कहीं उसकी कसर यहाँ गाड़ियों पर लोगो को पछाड़ कर तो पूरी नहीं कर रहे? चलिये एक छोटे सा वाक्या लेते हैं अगर रोड पर लगभग ठीक ठाक लोग गाड़ियां लेकर चल रहे हैं और आपको ज़रा से जगह मिलती है आगे निकलने की आप दौड़ा देते हैं न गाडी? जबकि आपको जल्दी भी नहीं होती, बस यही आगे निकलने की होड़ क्यों है? मैं मानता हूं ज़िन्दगी एक जंग है पर जिंदगी की जंग भी प्यार और इत्मीनान से जीती जा सकती है। मैं ये नहीं कह रहा की लोग सड़कों पर आगे सिर्फ इसलिए भागते हैं कि वो असल जिंदगी की भड़ास यहाँ निकाल रहें हैं मैं ये कह रहा हूँ यह एक कारण लगा मुझे। जो शायद वाजिब नहीं है। ये काम सारे कर रहें हैं चाहे वो चार पहिये वाला टैक्सी वाला हो या कोई अमीर।
किसी की कविता की चंद पंक्तियां है पढ़ियेगा अच्छा लगेगा।
किस बात की जल्दी है कहाँ जाना चाहते हो,
मरने से पहले ही क्यूँ मर जाना चाहते हो?
घड़ी के काँटो की तरह रेस लगाते - लगाते,
वक़्त की तरह क्यूँ गुजर जाना चाहते हो?
जिंदगी के कपड़े का एक छोटा सा धागा तुम,
स्वेटर बनने से पहले ही क्यूँ उधड़ जाना चाहते हो?
किस बात की जल्दी है कहाँ जाना चाहते हो?