Saturday, 27 February 2021

6 बजकर 15 मिनट वाली गाड़ी PART- 2

 
हमको 'एतना' तेज़ गुस्सा आया कि क्या कहें फिर क्या था हम हमारा पिट्ठू झोला और खाली ट्राली बैग लेकर भगे प्लेटफार्म नंबर 3 पर जाते जाते 3-4 लोगो से मुठभेड़ भी हुए पर सॉरी का गोंद लगा कर भागते रहे, आपको लग रहा होगा अब तो ट्रैन मिल ही जाएगी पर आप शायद भूल रहें हैं कि आजकल ज़िन्दगी हिंदी और अंग्रेजी दोनों का सफर करा रही है।

और अब आगे...

जैसे ही उतरे प्लेटफार्म नंबर 3 पर एक नई जंग शुरू हुई अब जंग थी अपना डब्बा ढूढ़ने की हमने दो लोगो से पूछा कि साहब ये D4 कहाँ मिलेगा किसी को खबर नहीं थी। हमने अपनी तेज़ नजर घुमाई और हमे कही दूर D2 चमकता दिखाई दिया, हमने अपने वन प्लस सेवन टी में समय देखा और समय हो रहा था 6 बजकर 13 मिनट हमने सोचा अब तो कौन ही रोकेगा अपनी गाड़ी में बैठने से अपने डिब्बे की ओर भागते हुए हमने कम से कम 4-5 दफा अपनी सीट का नंबर कन्फर्म किया और चढ़ गए अपने डिब्बे में, सारा डिब्बा खाली था हमने चौड़ में अपना ट्रॉली बैग अपनी सीट के नीचे धकेला और पिट्ठू बैग सीट पर फेंका और बैठ गए विंडो सीट पर, मस्त मुस्कान तैर रही थी मुखड़े पर और समय देखा तो स्क्रीन में 6 बजकर 14 मिनट चमक रहे थे, अचानक से एक epiphiny हुई अजी मेरा मतलब अचानक से एक एहसास हुआ मन किआ की ज़रा चेक करें कि डब्बा कौनसा है कॉन्फिडेंस इतना था कि बैग गाड़ी में ही छोड़ दिया और उतर गए डब्बा नंबर चेक करने, भाग कर देखा तो डब्बा मुस्काते हुए D3 चमचमा रहा था। हमने मन ही मन कहा हाय रे मोरी मैया! फिर भगे अपनी चौड़ वाली सीट पर, उठाया बैग और भगे D4 की तलाश में समय हो चला था 6 बजकर 15 मिनट और हमारा माथा टनक रहा था, तभी हमारी रेल गाड़ी ने बांग दे दी फिर भी हम भागते रहे पहले एस1 आया फिर एस2 फिर 3 करते करते एस8 तक पहुँच गए पर D4 नहीं आया फिर आगे बढ़े तो ऐसी वाले डब्बे चमक रहे थे और हमारी गाड़ी का दूसरा हार्न बज चुका था। ऑलमोस्ट उम्मीद खोते हुए हमने चार कदम और बढ़ाए की हमें थोड़ी दूर D4 चमकता दिखाई दिया हमने अपनी निन्जा रफ्तार बढ़ाई और चढ़ गए D4 में, बोगी में पहुँचे तो देखा एक भरा पूरा समूचा परिवार जिसमे तकरीबन 12 लोग थे ठुसे हुए थे और इस बार न विंडो सीट थी न aisle मन तो किआ दहाड़े मार कर रो दें पर जैसे तैसे खुद को उस भीड़ में सेट किया पर न जाने क्यों इस परिवार की 4-5 नन्ही बालिकाएँ हमें घूर रहीं थी और उनकी मातेश्वरी हमें खैर सबसे नजरें चुराई और सीट पर बैठने लगे फिर न जाने क्यों मन मे ख्याल आया कि एक दफा सीट नंबर औऱ चेक कर ले हमने अपना टिकट खोला डब्बा नंबर सीट नंबर यहां तक कि गाड़ी नंबर भी अपनी तसल्ली के लिए मिला लिया, खैर ऊपरवाले की दुआ से इस बार सब सही था। शायद पिछली बार D-4-33 होने की वजह से सब खिचड़ी होगया था और हम D-3- 33 में जा बैठे थे। अभी अपनी सीट पर बैठ भी नही पाए थे कि हमारी गाड़ी चल दी समय हो रहा था 6बजकर 17 मिनट। गाड़ी चली ही थी कुछ पांच सौ मीटर पर जाकर दोबारा रुक गयी, अब आपको तो पता ही है कि हम कितने ज्यादा ऑब्ज़र्वेन्ट इंसान हैं चूंकि हमारी सीट डब्बे के दरवाजे के बगल थी तो जैसे ही ट्रेन रुकी हमने देखा एक 23-24 साल का सांवला नवयुवक आंखों में गहरा काला सुरमा लगाए और सर पर काला गोटेदार साफा पहने दरवाजे से लटक रहा था और जैसे ही गाड़ी रुकी वो उतर गया और जाकर बगल से गुजरती पटरी पर जाकर बैठ गया कुछ सेकेंड गाड़ी रुकी और फिर हार्न देकर चल दी गाड़ी ने हौले से झटका लिया और पटरी पर सरकने लगी वो युवक वहीं बैठा रहा गाड़ी ने थोड़ी रफ्तार ली तब भी वह वही बैठा रहा फिर जब गाड़ी ज़रा तेज़ होने लगी वह भगा और चढ़ गया। तब मन मे एक एहसास आया कि शायद यह हम भारतीयों की प्रकृति में है या शायद ये फैशन में है कि अगर गाड़ी रुकी है तो अपने डब्बे से उतारना एक रिचुअल है जिसको निभाना अति आवश्यक। खैर आपको बस ये रिचुअल वाली बात ही बतानी थी बाकी तो यों ही हमने बक बक कर ली और आपको लम्बी सी कहानी सुना दी। आपने हमारी कहानी सुनी इसके लिए धन्यवाद ऐसे ही प्यार देते रहिये और बताइएगा जरूर कैसा लगा।

Thursday, 25 February 2021

6 बजकर 15 मिनट वाली गाड़ी PART-1

 सफर चाहे हिंदी वाला हो या अंग्रेजी वाला दोनों के अपने अपने रंग है रूप हैं और अपने अपने अफ़साने। आजकल अपनी ज़िंदगी में दोनों ही सफर चल रहे हैं। सफर भी और suffer भी। पिछले लगभग 1 साल से गायब होने के लिए सॉरी। जिनको नहीं पता है उनको बात दें कि आजकल हम हमारा झोला उठाए और एक 6x10 की खोली में अपने 3 बिज़नेस पार्टनर  के साथ जमीन पर देहरादून में सो रहें हैं। बिजनेस क्या है वो कभी और बताएंगे। तो योंही किसी काम से पिछले दिनों घर वापसी यानी कि लखनऊ जाने का सौभाग्य मिला। जैसे ही जाने का प्लान बना हमने झट से आई आर सी टी सी की वेबसाइट खोली और लगे ट्रेन तलाशने फ़ोन स्क्रॉल करते करते अचानक नज़र रुकी तो एक ट्रेन में 190रुपये 5 पैसे का टिकट दिखा रहा था और ऊपर स्याह रंग से लिखा था 2 टू एस, थोड़े घोड़े दौड़ाए फिर समझ आया कि ये वही जनरल डब्बे हैं जिसमे पूरे पैसे देकर कभी अपनी जान पर जुआं खेल कर किसी तरह दरवाजे, ट्रेन के शौचालय या अपने पिछवाड़े के किसी कोने से किसी दूजे की सीट पर टिक कर जाया करते थे, पर इस बार covid भैया की कृपा से पूरा पैसा देकर पूरी सीट मिल रही थी। हमारे मुखड़े के कोने पर एक सुनहरी मुस्कान तैर गयी। हमने झट से टिकट खरीदा और गूगल पे कर दिया। और खाते से जी एस टी समेत पूरे 201 रुपये 80 पैसे कट गए और साथ कि स्क्रीन पर एक टन्न से एक मैसेज और चमका जिसमे लिखा था Rs. 300 हैस बीन दिडक्टेड फ्रॉम योर एकाउंट बैलेंस xxxx. ताबड़तोड़ हृदयगति रुकी फिर मालूम हुआ कि मिनिमम बैलेंस मेन्टेन न करने के कारण ये फटका लगा है। अब क्या कर सकते थे। शाम के 18:15 मिनट वाली गाड़ी के टिकट पर अपने नाम की मोहर लगाई और चादर तानी और सो गए। 

दुनिया मे तमाम लोगो की तरह हम भी 2 स्टार्ट अप का हिस्सा हैं और जी जान लगा कर काम कर रहें हैं। आफिस शिफ्ट हो रहा था तो दिन भर उसमे लगे रहे, शाम को जब 4 बजा तो होश आया कि आज तो लखनऊ निकलना है, आनन फानन में स्कूटी पर बैठे अपना झोला पैक किया और दो रोटी जैसे तैसे ठूस कर निकल पड़े, घड़ी में समय हो रहा था 5 बजकर 32 मिनट कुछ 4 किलोमीटर आए होंगे कि स्कूटी अचानक से लहराने लगी जरा रोक कर देखा तो पीछे वाला टायर हंस रहा था उसने हमको देखा हमने उसको और मानो वो कह रहा हो और मियां बड़ी जल्दी में भाग रहे थे आओ तनिक सुस्ता लो, हमारा मन तो कलप गया पर करते भी तो क्या। हमारे हेमंत भैया जो गाड़ी चला रहे थे उन्होंने हमको देखा हमने उनको उनके चेहरे पर कुछ तो निराशा के भाव थे कुछ डर के, शायद डर इस बात का की हमारी गाड़ी न छूट जाए। उन्होंने फट से शाहरुख मंसूरी भाई को फ़ोन लगाया और उनकी एक्टिवा गाड़ी मंगा ली, फिर शुरू हुआ हेमंत दादा और हमारा अपनी किस्मत पर रोना थोड़ा वो रोए थोड़ा हम। खैर जैसे तैसे पहुचे देहरादून रेलवे स्टेशन और हमारी घड़ी में हो रहा था 6 बजकर 10 मिनट। अब इसे बुरी किस्मत कहें या मंद बुद्धि हमने आई आर सी टी सी से आए हुए टिकट को देख उसमे लिखा था P1-D4-33 जिसका अर्थ हुआ आपकी गाड़ी प्लेटफार्म नंबर एक पर आएगी जिसमे बोगी नंबर D4 में आपकी सीट नंबर 33, हम स्कूटी से उतरे और भागे ज़ोर से आओ देखा न ताओ चढ़ गए एसकेलेटर पर ऊपर पहुचे तो जान पड़ा यहां तो प्लेटफार्म नंबर 3 से सब शुरू है फिर नीचे भागे किसी तरह पूछा तो पता चला प्लेटफार्म नंबर 1 का रास्ता नीचे से है। जैसे कि प्लेटफार्म नंबर एक पर पहुचे वहां 2 गाड़ियां खड़ी थी अरे भाई एक गाड़ी प्लेटफार्म नंबर 1 पर और दूसरी 2 पर दोनों की लखनऊ के रास्ते होकर जाती थी पर हमारी गाड़ी का नंबर न जाने क्यों उन गाड़ियों के नंबर से मेल नहीं खा रहा था, तभी पीछे से एक देवी जी बोली '66 प्लेटफॉर्म नंबर 3 पर खड़ी हैं' हमने गौर किया तो ये वो रेलवे वाली जीजी थी जिन्होंने एक बार पुनः दोहराया attention please train number 04266 via haridwar, moradabad bareilly to Lucknow is standing on platform number 3. हमको 'एतना' तेज़ गुस्सा आया कि क्या कहें फिर क्या था हम हमारा पिट्ठू झोला और खाली ट्राली बैग लेकर भगे प्लेटफार्म नंबर 3 पर जाते जाते 3-4 लोगो से मुठभेड़ भी हुए पर सॉरी का गोंद लगा कर भागते रहे, आपको लग रहा होगा अब तो ट्रैन मिल ही जाएगी पर आप शायद भूल रहें हैं कि आजकल ज़िन्दगी हिंदी और अंग्रेजी दोनों का सफर करा रही है...


जुड़े रहिये अभी कहानी खत्म नहीं हुई है एक भाग और आना बाकी है, आइयेगा जरूर। पिंकी प्रॉमिस?


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