Saturday, 2 November 2019

माँ-बाप का स्कूल।

काफी समय होगया है, कहीं दूर गये हुए आखिर बार दिल्ली में ज़रा भटकने निकले थे जिसकी कहानी अभी आपने सुनी नहीं है, अरे अरे उतावले मत होइए वो भी सुना देंगे। उसके पहले सुनिए किस्सा पहाड़ो का। यों ही बैठे बैठे एक दिन मन में ख्याल आया की क्यों न कहीं की सैर कर ली जाए वक्त काफी होगया था कहीं भटके। बस मन में ख्याल आया और हमारा लखनऊ का खुराफाती दिमाग दौड़ पड़ा। तो भैया प्लान बना देहरादून के एक हवाईजहाज़ वाले बड़े रेस्तरां में खाना खाने का। अगले दिन सुबह उठे उसके बाद कभी नीली, कभी सफ़ेद, कभी काली, तो कभी नीली शर्ट आजमा ली, पर कुछ खास मज़ा नहीं आया। आखिर में जैसे तैसे मन को समझाया कि तुम डूड हो कुछ भी पहन लो। खैर आईने में खुद से तमाम जद्दोजिहद के बाद हमने विदा ली और पहुँचे हाईवे 58 पर। तमाम ऑटो वालों ने हमे जबरन ऋषिकेश छोड़ने की तमाम कोशिश कर डाली पर हम अपने इरादे की पक्के थे जाना तो देहरादून ही था। थोड़ी देर में एक नब्बे के दशक वाली किडनेपिंग गाडी आई और हमारे पास रुकी, हमने फटाफट से फिरौती की रकम के लिए अपने घर वालों का नंबर मन ने दोहरा  ही रहे थे की अंदर से आवाज आई, हाँ भई देहरादून? इतना सुनते ही हम लपक लिए गाड़ी में, अंदर दो बच्चे उनकी माँ-बाप और दो और लोग बैठे थे। सबने हमको ऐसे देखा जैसे हमने उनके घर में किसी को छेड़ दिया हो, बुद्धि लगाई तो समझ में आया की 3 जन की सीट पर हम चौथे प्राणी आकर बैठ गए थे हमने उनकी नाराजगी समझी और घुस गए यू-टूब में। धक्के खाते खाते तकरीबन डेढ़ घंटे बाद हम पहुचे देहरादून की आई एस बी टी। यहाँ भी वही नज़ारा था सब हमें अपनी अपनी बसों और ऑटो में भरने लेने को उतावले थे। जान बचा कर एक कोने में आए और गूगल बाबा को याद किया उन्होंने हवाईजहाज़ वाले रेस्तरां का जैसे ही किराया बताया हमने तौबा कर ली, पर अब सवाल ये थे की भई आ तो गये अब सर मारा कहाँ जाए। तो हमने अपने एक दोस्त को फोनिया दिया, बड़ी मान मनोती के बाद वो माने वो भी आए तो बस 5 मिनट के लिए। अब हमको भूंख लग आई थी भैया हम ठहरे लखनऊ वाले अंजान शहर जाए और खाना न खाए ऐसा कैसे? खाया पिया और सोचा अब चलते हैं दिन तो बर्बाद हो ही चूका था। हमने भी बस वालों की ज़बरदस्ती मान ही ली बैठ गए वापस हरिद्वार की बस में, जैसे ही बस चली हमारे सामने वाली सीट पर एक 10 बरस का लड़का और एक लगभग 8 बरस की लड़की अपनी माता जी एक साथ आकर बैठ गए। फिर शुरू हुआ उनका तांडव। जब हम इतने बड़े घोड़े होकर ज्यादा देर बिना खुराफात के नहीं बैठ सकते तो वो कहाँ से बैठने वाले थे। हम कितने भी बड़े हो जाएं बसों में हमारी वाली खिड़की का शीशा जब तक ज्यादा न खुला हो ऐसे लगता है हमारे आत्म सम्मान पर किसी ने आघात किया हो, हममें और उन बच्चों में शुरू होगया खिड़की का जंग लगभग 5 मिनट तक खिड़की से पोसम पा करते रहे, तब तक हमने देखा माथे से नारंगी सिन्दूर भरे और काले होंठों पर मेहरून रंग की लिपस्टिक के साथ लगभग काले रंग की आउट लाइन बनाए उनकी माता श्री हमें आँखे तरेर के देख रहीं है, हमारी रूह कांप गयी पर ढीट तो हम हैं ही किसी तरह थोड़ा सा शीशा खुलवा ही लिया फिर उनका कार्यक्रम शुरू हुआ, कभी उठना कभी मचलना, मचल वो रहे थे और यातनाएं हमारे पैर सह रहे थे। करुणा भरी निगाहों से मैंने उनकी ओर देखा उस नामुराद लड़ने ने एक बुरी सी मुस्कराहट देते हुए ज़ोर का हमारे सफ़ेद जूतों पर मारा और उनका मुँह काला कर दिया। मरता क्या न करता उनको प्यार से समझाया। खैर थोड़ी देर तो शांति थी फिर निकला उनका कुरकुरे का पैकेट असली कहानी तो अभ शुरू होती है, बेरहमी से उस लड़के ने पैकेट फाड़ा और मेरी तरफ देखते हुए खिड़की से बाहर उड़ा दिया। मन में एक टीस उठी पर उनकी माता श्री की घूरती आँखों के डर से हमने अपने आपको को समझाया। हम इतना सोच ही रहे थे की उन्होंने अपना कुरकुरा खत्म कर के बचे हुए पैकेट को खिड़की से बाहर निकाला और उसमें हवा भरने लगे और ऐसे खुश हो रहे थे जैसे मानो की बॉलीवुड की कोई सुंदरी अपना दुपट्टा खिड़की से बाहर निकाल कर हवा में लहरा रही हो। हम अपनी हिम्मत जुटा ही रहे थे की ऐसा मत करो तब तक उन धूर्तों ने जबरदस्त झटके के साथ उस पैकेट को हवा में उड़ा दिया और नाच उठे। हमने उनकी माता श्री की तरफ देखा वो भी खुश नज़र आ रहीं थी अपने बच्चों की इस सफलता पर।
तभी मेरे दार्शनिक मन में एक ख्याल आया की हम बड़ी दुहाई देते हैं बच्चों की पढाई की क्या हमें कुछ ऐसे विद्यालयों की जरूरत नहीं की वो माँ बाप को पढ़ा सकें। वो बता सकें की बस बच्चों की डिग्री या क्लास में आए नंबर ही पर्याप्त नहीं है, सड़क की सफाई, बस की सफाई या कोई भी भी सामाजिक जिम्मेदारी भी जरुरी है। हर तीसरे दिन मैं देखता हूं कभी ऑटो में बसों में रेलवे स्टेशन पर बच्चे अपने माँ बाप के सामने तमाम कचरा करते रहते हैं और उनके माँ बाप चूं भी नहीं करते। जिस तादाद से मैंने यह देखा है मुझे लगता है हर बस्ती हर गली एक ऐसा स्कूल जरूर होना चाहिए।

नोट:- कृपया आदर्श माँ बाप अपने स्वाभिमान और आत्म सम्मान पर इस बात को जरूर ले।
धन्यवाद।

Tuesday, 1 October 2019

इत्मीनान।

सुन लो भैया एक और दास्तां, आ ही गये थे लखनऊ तो सोचा अपना दार्शनिक 'मोड' ऑन कर लें। तो हुआ ऐसा की हमे दिल वालों की दिल्ली में ज़रा कुछ काम आन पड़ा तो भई हमने सोचा क्यों न अपने शहर की हवा से भी मुलाक़ात कर लें। तो बस वही अपनी पुरानी साथी स्प्लेंडर उठाई और चल दिए सैर पर। शाम ढल चुकी थी, योगी जी के राज में तमाम गलियां और सड़के मुँह में गुटखा दबा चुकी थी चूँकि मौसम बारिश का था। हम भी ढीट ठहरे फंदा दिए अपनी स्प्लेंडर वहीँ पर, सड़कों ने हमे आँखे तरेर के देखा और बोली ख़बरदार जो दुबारा हमारा गुटखा ख़राब किये तो 1090 पर केस ठुकवा देंगें। हम भैया डरे क्योंकि ज़माना है 'वुमन एम्पावरमेंट' का और दुबक लिए एक कोने में। बचते बचाते जब हम मेन रोड पर पहुंचे तो पता चला यहाँ तो रेस खेल रहे थे सारे गाड़ी चालाने वाले। हमे सारी गाड़ियां एकदम राजनेताओं जैसी लग रही थी की बस किसको कैसे पछाड़ा जाए कहाँ से कट मारा जाए की हम आगे हो जाएं, कुछ भैया लोग तो ऐसा हार्न लगा कर गाड़ी सरपट दौड़ा रहे थे जैसे बाइक नही ट्रक लेकर चल रहे हों, तो वही किसी के हार्न से नागिन डांस की धुन निकल रही थी, वो धुन इतनी शानदार थी की हमारी स्प्लेंडर ने चलने से मना कर दिया बोली अब हम आगे बढ़ेंगे तो नाचने के बाद ही। बड़ी सर फुट्टवल के बाद वो मानी तब आगे बढ़े और हम भी बन गए उस रेस का हिस्सा। पर गाड़ी चलाते समय एक एहसास, एक ख्याल आया अब वो आप पढ़िए और हमे बताइये की भैया तुम सही हो या फिर अमा यार कुछ ढंग का काम किया करो। तो हुआ ऐसा जब हम अपनी तुन्तुनाई हुई स्पेलेंडर लेकर सड़क पर निकले जहाँ एक अजब गजब भीड़ थी और अगल बगल से शियूं शियूं से निकलती गाड़ियां थी ऐसा लग रहा था कि सबके पीछे स्कूल के पीटी वाले मास्टर साहब पड़े हैं, अगर भागोगे नहीं तो छड़ी पड़ेगी। पर एक अचंभा और भी था वो शियूं शियूं गाड़ी निकालने वाले सिर्फ नए जवान हुए लड़के ही नहीं थे वो भी थे जिनके मुँह तक पोपले हो चुके थे (यह पंक्ति इसलिए लिखी है ताकि हमारी जनरेशन के प्रति जजमेंटल न हुआ जाए की हम ही तेज़ गाडी चलाते हैं)। खैर उस भीड़ में सब खैरियत था न कहीं जाम था, न भगदड़ फिर भी लोग सड़क पर सांप सीढ़ी खेल रहे थे कोई इधर से घुस रहा था कोई उधर से कुछ लोग शायद मौत का कुआँ भी खेल रहे थे और हमे लग रहा था डर, अब आप सोचेंगे अभी तो ये ढीट था अब डर, तो अरे भई हम भी तो अपने घर वालो की ज्यादाद के अकेले वारिस थे न। हम भी आपको बहुत भटकाते हैं तो खैर ये खेल देख कर बड़ा अजीब सा एक ख्याल आया हमे लगा ये जो सड़कों पर जबर्दस्ती की जल्दी है, एक दूसरे को पछाड़ने की होड़ है, कैसे भी करके नियम तोड़ कर आगे बढ़ने की जो जहमत है कहीं ये असल जिंदगी की हार को छुपाने का तरीका तो नहीं? हम ज़िन्दगी में तमाम मोड़ पर हार जाते हैं, टूट जाते हैं, पर हमारा बस वहां नहीं चलता तो कहीं उसकी कसर यहाँ गाड़ियों पर लोगो को पछाड़ कर तो पूरी नहीं कर रहे? चलिये एक छोटे सा वाक्या लेते हैं अगर रोड पर लगभग ठीक ठाक लोग गाड़ियां लेकर चल रहे हैं और आपको ज़रा से जगह मिलती है आगे निकलने की आप दौड़ा देते हैं न गाडी? जबकि आपको जल्दी भी नहीं होती, बस यही आगे निकलने की होड़ क्यों है? मैं मानता हूं ज़िन्दगी एक जंग है पर जिंदगी की जंग भी प्यार और इत्मीनान से जीती जा सकती है। मैं ये नहीं कह रहा की लोग सड़कों पर आगे सिर्फ इसलिए भागते हैं कि वो असल जिंदगी की भड़ास यहाँ निकाल रहें हैं मैं ये कह रहा हूँ यह एक कारण लगा मुझे। जो शायद वाजिब नहीं है। ये काम सारे कर रहें हैं चाहे वो चार पहिये वाला टैक्सी वाला हो या कोई अमीर।

किसी की कविता की चंद पंक्तियां है पढ़ियेगा अच्छा लगेगा।

किस बात की जल्दी है कहाँ जाना चाहते हो,
मरने से पहले ही क्यूँ मर जाना चाहते हो?
घड़ी के काँटो की तरह रेस लगाते - लगाते,
वक़्त की तरह क्यूँ गुजर जाना चाहते हो?
जिंदगी के कपड़े का एक छोटा सा धागा तुम,
स्वेटर बनने से पहले ही क्यूँ उधड़ जाना चाहते हो?
किस बात की जल्दी है कहाँ जाना चाहते हो?


Tuesday, 3 September 2019

कसोल तक का सफर और शेरू Part 2


Kheerganga Top
टीले पर पहुंचकर जब मैंने अपने नजर दौड़ाई तब तो कुछ पर तो होश में होकर भी बेहोश था, पार्वती नदी का वो दहाड़े मार कर बहते पानी में मुझे इतना सुकून मिल रहा था कि मैं वही बैठ गया और बैठे बैठे कब सो गया पता नै चला। थोड़ी देर में किसी ने मुझे आवाज लगाई तो मैं उठा, चारो ओर हरियाली थी, पानी बह रहा था उस जंगल में टन-टन बजती गाय की घंटियां, उस टीले से दीखता हिमालय सूरज की रौशनी पड़ने से सोने जैसा चमक रहा था। मेरी बेहोशी मुझपर फिर

से छाने लगी थी इतनी ख़ूबसूरती मैं ज़माने बाद देख रहा था। खैर मैंने खुद को संभाला और अपने कैंप में आगया। उसके बाद रात में आग के आस पास बैठ कर कुछ मुशायरे हुए कुछ बात हुई, कुछ इश्क़ हुआ कुछ तकरार हुई। इसी के साथ उस दिन की रात भी ढल गयी अगली सुबह कैंप में उठा तो हर तरफ दरवाजा पीटने की आवाजें आ रहीं थी, बाहर निकला तो देखा कुछ लोग अजीब तरह से मटक कर चल रहे थे, कुछ भाग रहे थे और कुछ अजीब सा नाच नाच रहे थे, माजरा क्या है समझ नहीं आया फिर पता चला की आज नदी से आने वाला पाइप टूट गया है जिसकी वजह से कहीं पानी नहीं है। मैं सबके नाच और मटकती कमर का राज समझ गया। खैर जैसे तैसे सब सुलटा चाय चली, महफ़िल जमी और फिर हम तैयार हुए 'बिग डे' के लिए आज हमें ट्रैकिंग पर खीरगंगा जाना था। हम तैयार हुए बढ़िया ग्रुप फोटो ली और चल पड़े बरसैनी की तरफ तकरीबन दो घंटे बाद हम पहुँचे बरसैनी डैम और वहां से कुछ खाने पीने का सामान लिए क्योंकि इसके आगे सामान महंगा हो जाता है और जल्दी मिलता भी नहीं है। हमने उतर कर गाइड लिया और कर दी चढ़ाई पहाड़ पर और वहीँ मेरी मुलाक़ात हुई शेरू से और तबसे शुरू हुई हमारी रेस। शुरू के 20 मिनट की चढ़ाई करने के बाद मुझे तो लगा की मेरा दिल अब धकड़ के बाहर आया की तब। किसी तरह हम पहले पहुँचे कालगा गांव वहां हमने 10 मिनट आराम किआ और फिर शुरु हुआ हमारा असल सफर। मैं हर कदम के साथ उस बेसब्र दूल्हे जैसा होता जा रहा था जिसकी शादी आज शाम को हो मैं पूरा पहाड़ चढ़ने को बेताब था वहां के नज़ारे देखने को बेताब था। और मेरा सब्र हर पल टूट रहा था पर भला हो शेरू का जिसकी रेस ने मुझे मेरी सब्र की रस्सी से बांधे रखा।  पूरे सफर में कहीं धूप कहीं छाओं, कभी बारिश कभी सुनहली धूप दिख रही थी, बगल से बहती पार्वती नदी की दहाड़ हर दम सुनाई पड़ रही थी। में में करते भेड़, घंटिया बजाते घोड़े, अमिताभ बच्चन से लंबे पेड़, चीड़ के पेड़ों से अति सोंधी सोंधी महक, हर 3-4 मील पर बहता झरना, मुस्कुराते स्वागत करते पहाड़ी चेहरे, मैगी और चाय की ललचाती महक ये सब मुझे दीवाना बना रहे थे वहीँ दूसरी तरफ पैरों में पड़ते छाले, जवाब देते घुटने और अधूरी आती साँसे, लेकिन वो नज़ारे, वो खुश्बू और शेरू इन सब ने मुझे हिम्मत बँधाए रखी और मैं चलता रहा। साढ़े चार घंटे चलने के बाद मुझे मेरी मंजिल नज़र आई पर सिर्फ नज़र आई अभी उसकी चढाई और बची थी वो भी खड़ी चढ़ाई। मैं थक चुका था पर ऊपर जाकर उन पहाड़ो को देखने के लालच के आगे सब धरा रह गया मैं उठ खड़ा हुआ और बढ़ गया आगे चलते चलते पहुंचा तो मुझे नहीं पता मेरी थकान का क्या हुआ, मैंने देखा तो बस काले पहाड़ जगह जगह बर्फ से ढके हुए और मानो मेरी ओर मुस्कुरा कर कह रहे हो आगये उस्ताद आओ मैं तुम्हे अपनी बाहों में भींच लेता हूं तुम यहाँ महफूज हो। मैं उन पहाड़ों की ओर देख कर मुस्कुरा दिया और हाथ मुँह धोया गप्पशप्प लड़ाई, और निकल पड़ा घर की ओर।
Parvati Valley

Wednesday, 14 August 2019

बदल गया आज़ादी का जश्न।



आज 15 अगस्त के दिन सुबह सुबह जब सड़कों पर निकला तो मन में एक अजीब से टीस उठ रही थी, न जाने क्यों?
मैं सैड़कों पर कदम बढ़ाए जा रहा था, अगल बगल राखी की दुकानें सजी थी, और मैं किसी विदा होती नई नवेली दुल्हन जैसे मुँह लटकाए था। मैं कोशिश जरूर कर रहा था यह जानने की कि मेरे साथ यह हो क्या रहा है? क्यों मन ऐसा चुस्त सा नहीं है। पर मेरा दिमाग मुझे किसी सरकारी दफ्तर के अफसर जैसे जवाब देने से बार-बार मना किये जा रहा था मैंने भी हार कर कोशिश छोड़ दी। चलते चलते जो एक चीज़ मैं देख रहा था वो थी स्कूल के बच्चे, उनके खिले चेहरे, चमचमाती उनकी यूनिफार्म, कुछ साइकिल पर थे तो कुछ पैदल, कुछ दोस्तों के साथ थे कुछ अकेले थे। इनको देख पर मन थोड़ा खुश सा हुआ और मुझे मेरे अपने स्कूल के दिन याद आगये की कैसे 15 अगस्त आते ही हम अपने माँ पिताजी से नए नए झंडे लाने की जिद्द करने लगते थे, और कभी कभी तो खुद सादे कागज पर ज्योमेट्री बॉक्स से पैमाना निकाल कर तिरंगा बना लिया करते थे और फिर कभी वाटर कलर, तो कभी स्केच, तो मोम वाले कलर से रंग भर लिया करते थे। और वो न टूटने वाले स्कूल से मिलने वाले लड्डुओं की उत्सुकता। एकाएक मेरी नजर इन बच्चों पर पड़ी इनके हाथ सूने थे न कोई झंडा न कोई तिरंगे का तमगा न वो ख़ुशी और न ही लड्डू, था तो उनके हाथ में लॉलीपॉप या एंड्रॉयड फ़ोन।
मन और खिन्न सा होगया बदलता बचपन देखकर, मॉडर्न होना अच्छा है, बड़े होना अच्छा पर बचपन खोना नहीं।
आज़ादी मुबारक।

Sunday, 11 August 2019

कसोल तक का सफर और शेरू। Part I

मैं हर कदम उन वादियों में बढ़ रहा था, बिना सोचे समझे। ऊँचा- नीचा रास्ता, हरी भरी झाड़ियां, अमिताभ बच्चन से भी लंबे पेड़ और अपनी आगोश में भरते दूध जैसे सफ़ेद बादल, कल कल करते झरने और मेरे साथ चलता पहाड़ी कुत्ता शेरू। एक तरफ़ा रेस हो रही थी मुझमे और शेरू में। वो भी जिद्दी था और मैं ढीठ। खैर उन खूबसूरत, नशीली वादियों का रास्ता शेरू को ही पता था तो मैं उस रेस से लगभग बाहर ही था और शायद ये बात शेरू को भी पता थी इसलिए जनाब शेरू आराम से रुक रूक कर, जगह-जगह लघु शंकाओं के स्टॉपेज लेते किसी प्राइवेट बस जैसे चल रहा था। मुझे भी इस बात का अफ़सोस नहीं था क्योंकि इन वादियों से मुझे इतना इश्क़ था कि मैं रात भर न सोने के बाद भी पहाड़ की पगडंडियों पर सध कर चल रहा था, जैसे मेरा रोज़ का आना जाना हो।
खैर ये सब बात तब की है जब मैं एक ट्रेवल कमपनी के साथ दिल्ली में रह कर, सिनेमेटोग्राफर का काम कर रहा था।
घूमने का कीड़ा मुझे बचपन से और एक जगह न रुक पाने की बीमारी भी, ये मेरी बीमारी इतनी बुरी है कि मैं बचपन में पढ़ाई भी छत पर घुमते हुए करता था। खैर तो बस इसी कीड़े ने हाथ में कैमरा थमा दिया और घूमने की लत लगा दी। और मैं निकल चला हिमाचल प्रदेश। शाम के 6 बजे मैं दिल्ली की मार पिटाई सहते और अतिशुद्ध हवा में सांस लेते हुए निकल चला। रात भर मेरी गाड़ी में गाने बजे, बारातियों जैसा डांस हुआ क्या नागिन क्या सपेरा मैं डांस का और डांस तू मेरा, कुछ ऐसा ही देखने को मिल रहा था। कुछ देर में सब सो गए और मैं खिड़की से बहार निगाह टिकाए बदलते रास्तों को देखता रहा, कैसे एक ही देश में कुछ मील के अंतर पर पानी सड़के लोग और उनकी आदतें बदल रही थीं। कहीं सड़कें सीधी, कहीं ऊँची कहीं नीची कहीं सांप जैसी तो कहीं ऐसी थी जैसे मानो किसी ने ज्योमेट्री बॉक्स वाली स्केल से सड़क खींच दी हो। उन सड़कों को देखते देखते मुझे अचानक से ज़िन्दगी के हाल याद आगये किस तरह हमारी ज़िन्दगी भी यों ही बदलती रहती है, कभी इस डगर सीधी तो कभी उस डगर टेढ़ी। यह सोचते सोचते मैंने सोचा की जब लोग इन बदलती सड़कों का मज़ा ले सकते हैं तो जिंदगी का क्यों नहीं, फिर क्यों शिकायते आती हैं? खैर ये सवाल मैं आप पर छोड़ता हूँ।

नीली-पीली-लाल बत्तीयां और हवा बदलते देखते मुझे नींद आगयी और फिर मैं उठा अगली सुबह 5:30 बजे हलकी हलकी सुबह हो चुकी थी उर्दू में कहूँ तो फ़ज़र का वक़्त था। मेरी गाड़ी थोड़ी देर में रुकी मैंने दूर से अपनी मेहबूबा को तलाशा और थोड़ी देर में मैं उसकी बाहों में नशे में धुत्त था, वो इतनी गर्म थी कि मानो कह रही जो अपने सारे गम मुझमे पिघला दो और मैं उसको देखे जा रहा था, और घूँट घूँट पिए जा रहा था, और साथ में पार्ले जी बिस्किट थोड़ा उसे खिला रहा था थोड़ा खुद खा रहा था, जी हां मैं चाय पी रहा था। कुछ देर में मेरी मेहबूब मुझसे जुदा हुई और मैंने भी उससे अलविदा ली क्योंकि मेरा इश्क़ मुझे बुला रहा था। मैं गाड़ी में चढ़ा और फिर खिड़की पर सर टिका दिया उसके बाद मुझे सिर्फ घुंगराले बालों से घुमते रास्ते, पहाड़ो की महकती खुशबु और वक़्त के साथ बहता पानी ही याद है इसके सिवा कुछ याद है तो बस बीच-बीच में शियूं-शियूं से निकलती दूसरी गाड़ियों की आवाज। मैं कब 16 घंटे का सफर पूरा कर कब कसोल पहुँच गया पता ही नहीं चला। मैं कैंप पहुंचा अपना बैग रखा कैमरा उठाया चप्पल पहनी और निकल गया पार्वती नदी के सबसे ऊंचे टीले पर, उसके बाद जो मेरे साथ हुआ वो आज भी मेरी साँसों में नशा बनकर दौड़ता है।
क्या हुआ उसके बाद इसके लिए पढ़िए भाग 2



Monday, 5 August 2019

Why we don’t trust God?




Some of you might find the blog incomplete and vague, but read it carefully you will gain a lot.

You can often listen people saying that I am atheist and that too proudly.
Existence of God has always been a big question to human as well as science. We can see number of questions popping regarding believing in God. If you are a person who believes in God and says it in a group you might become the subject of joke or might humiliation. People might start asking you questions like, have you ever seen God, if not why and do you believe in God and also how?
Some people even consider God as their ultimate sponsor, who is responsible for every MISHAP in their life.
If you believe in God, people can ask you, if God is omnipresent and he is so powerful, why I have to face different problems in life, why people are dying, why people are being murdered or families are orphaned etc. Dear it is life and it is life and it goes that way. God has not taken any responsibility, he has created this universe and has given you all the authorities and rights to live, now it is up to you how you make it. I’ve seen people saying that I was stuck in certain situation and I prayed to God but he did not come to help. Ok I have a question for them all, have you ever tried to cook vegetable? Most probably yes, so what do you do? You have to wash it, cut it, put it in a pan, add spices etc. Than you get to eat it right? That is the answer to your question, simple and sorted.


Let me tell you a short story. “ Once upon a time a village called Pamda was struck by flood, the water level was rising rapidly every second. Government ordered to evacuate the village as soon possible, the evacuation started, a team on truck came to a man and asked to come along with them but he refused saying God will help him, later the water level increased and a boat was sent for evacuation when boat came to the man he said no I won’t go in a boat the God will help me. After few hours a final evacuation team came with a helicopter to take that man but he refused again that only God will help him. The water level increased and later the man died. When the man reached heaven he was very angry, God asked the reason, he said I died due to drowning and you did not come to help me why so? God replied son who do you think sent you the truck, boat and helicopter?”
Same is with us.
Believing in God or not believing in God is up to you.
This is just a small note to tell you how to believe in God, because the only reason we don’t believe is God is that we have a lot of complains against him. But do we really deserve to complain?
Have a look at you deeds.
Good vibes.

Saturday, 27 July 2019

धुंए की सफर

कुछ दिन पहले मैं हरिद्वार स्टेशन पर तकरीबन 2 महीने बाद उतरा था। आखिर कॉलेज की पढ़ाई दोबारा जो शुरू होगयी थी। मैं मन में शेख चिल्ली जैसे ख्वाब बुन रहा था कि कैसे जाऊंगा बैग रखूँगा, मस्त आराम करूँगा और जी भर के अपने यार दोस्तों के साथ गप्पे लड़ाऊंगा। इतना सोचते सोचते आगे बढ़ ही रहा था कि एकाएक कहीं से आवाज आई- "भगवान के नाम पर कुछ दे दे रे, भगवान तेरा भला करें। इतनी धूप में 35 किलो के दो झोले लेकर चल रहा था, मुझे उसकी ये बात कुछ मज़ाक जैसी लगी। खैर मैंने उसे पैसे देने के बजाय अपने साथ बैठाकर थोड़ा खाना खिलाया और आगे बढ़ा। मन अजीब सा प्रसन्न हो रहा था, एक तो मैं हरिद्वार में था दूसरा किसी भूंखे को खाना खिलाया, ऊपर से हरिद्वार की भक्ति वाली खुमारी थी की अचानक मेरी नाक को एक खुश्बू ने धमाकेदार सलाम ठोका मैं पहले तो हिला, कुछ खाँसा और नजर घुमाई तो देखा एक कोने में कुछ मेरे उम्र के 5-10 हट्टे कट्टे नौजवान, बजाकर भोलेनाथ का गाना, भर के चिल्लम, भट्टी बन उसे फूंके जा रहे थे। मुझे बड़ा झटका लगा, इसके पहले मेरा मन और दार्शनिक होता मैंने सोचा यह तो फैशन है और इसके बिना समाज में इंसान कूल कहाँ? मैं आगे बढ़ा और बढ़ते ही देखा एक कचरे के ढेर के पास एक मटमैले रंग की शर्ट के साथ लगभग तहमद जैसी पैंट पहने और पीछे से क्रिकेट के 30 यार्ड वाले सर्किल जैसा टकला लिए, मुंह में सुट्टा दबाए, कचरे के ढेर पर दे दे कर जोरदार पेशाब करे जा रहा था, और उसके पास सरकारी दफ्तर के भीड़ जैसे उसके अगल बगल मक्खियां मंडरा रही थीं। मुझे अचानक जिस ट्रेन से मैं आया था उसकी हूबहू सूरत उस आदमी में दिखी। धुआं उड़ाता पानी छोड़ता और रोब में खड़ा था और साथ सवारियां जैसी भिनभिनाती मक्खियां।
मैं काफी थक चूका था तो न ज्यादा सोचने की हिम्मत थी न ही मन। मैं आगे बढ़ा और ऑटो वाले से पूछा भैया यूनिवर्सिटी चलोगे? ऑटोवाले ने मुझे देखा मेरी हालात पर बिना तरस खाए, दो काश बीड़ी के लिए और पूरी शान में कहाँ 250 रूपए, मैंने ऑटोवाले से तौबा की और आगे बढ़ गया। और फिर इन बीड़ी सिगरेटों के सिलसिले की मार झेलता रहा और उस धुंए के बीच बॉलीवुड के एक्शन फिल्म के नायक जैसे उसमे से निकल रहा था।
इस बीच तमाम बार मैंने कपाल भांति की, बस वो थोड़ा मॉडर्न वाला था। मुझे आभास हुआ की जिस भूमि पर अगरबत्ती का धुआं और पुष्पों की महक होनी चाहिए वहां यह धुआं। क्या यह इंसान स्वयं के साथ, पृथ्वी के साथ और हरिद्वार  के नाम के साथ न्याय कर रहा है? खैर मैंने भी आपको ज़रा सी बात  बताने के लिए तमाम कहनी सुना डाली। खैर सोचियेगा आप भी और अगर आप भी इंसान ट्रेन हैं तो जरूर बताइयेगा।

Wednesday, 3 July 2019

अस्पताल में तोते और गुब्बारे।



हाँ मैं मानता हूं ये शीर्षक बड़ा अलबेला है, पर ये सच है, थोड़ा अटपटा है पर, सच है, अस्पताल जैसी जगह में ये देखना थोड़ा अजिब लगता भी है। हुआ ये की मैं कुछ दिन पहले अपने वीजा के सिलसिले में पंहुचा किंग जार्ज मेडिकल विश्वविद्यालय, अब इंसानी फितरत ऐसी है कि चीज़ों के नाम के हिसाब से अपनी मानसिकता बना लेता है। अस्पताल की बात सुन कर मेरे मन में भी करुणा दया के भाव उठ खड़े हुए एक अजीब सी शांत उदासीनता मन में छा गयी पहले मन किआ लौट चालू वापिस पर अब आ गए थे और काम भी करवाना था तो बस चलते रहे। धूप तेज़ थी हेलमेट के अंदर भी सर जल रहा था बेचैनी बढ़ रही थी मैं फिर से अपनी स्प्लेंडर को भगाए जा रहा था। अस्पताल में दाखिल हुआ, पार्किंग लॉट में गाड़ी खड़ी करी पीली पर्ची हाथ में थामी और भीड़ का हिस्सा बन गया, खो गया मरीजों और तीमारदारों की भीड़ में अंदर पंहुचा तो ऐसा लगा मानो सारा शहर ही बीमार हर ओर मायूस लटकते चेहरे, चुप्पी साधे पर बहुत कुछ बोलते चेहरे पर सबकी चुप्पी का एक ही मतलब था, उदासी, मायूसी, तड़प,दुःख बस और कुछ नहीं। यह सब देख कर मन और दुखी होगया फिर याद आया यह संसार है ही ऐसा जो आज है उसे कल मिटना ही होगा। इतना सोच ही रहा था तब तक किसी ने पीछे से ज़ोर का धक्का मारा और बोला अरे भाईसाहब आपको कोई काम है तो उस ओर जाइये यहाँ खड़े होकर बेवजह दूसरों को परेशान मत कीजिये मुझे इस बार बड़ी गुस्सा आई नामुराद ने अच्छे खासे आते विचारों को धक्का दे दिया फिर मैंने भीड़ की ओर नज़र उठाई सरकारी अस्पताल का बोर्ड देखा और मन ही मन मुस्कुरा कर आगे बढ़ गया। अगली बारी लाइन में लग कर पर्चा कटवाने की थी लाइन देख कर एक बार को तो मन किया कि अपने हथियार डाल दूँ पर ऐसे कैसे हम भी ढीठ थे, घुस गए अकेले लाइन में उसके बाद जो सिलसिला चला है धक्कों का भाईसाहब इधर हटिये उधर जाइये, कभी कभी अस्पताल के कर्मचारियों और तीमारदारों की लड़ाई का सिलसिला चलता रहा और हम भी उस लड़ाई में दो चार बार घायल हुए पर हिम्मत नहीं हारे। किसी ने हमारे पैर के अंघुठे तोड़े किसी ने उंगलियां। इतना यहाँ से वहां दौड़ लिए की मत पूछिए अगर इतना मैराथन में दौड़ लिए होते तो विश्व की सबसे बड़ी मैराथन में अव्वल आते। खैर ये तो मन को समझने वाली बात है। किसी तरीके से सारा काम खत्म किया अपने हाथों में सुईयां भूकवाई, खून दिया और चलते बने फिर उसी धक्का मुक्की में, उदासी में, मसुसियत में अस्पताल के बाहर निकले तो पता चला बारिश हुई है पानी से अस्पताल की सड़कें स्विमिंग पूल बन गया था लोग चाय की टपरियों पर अपना उदास आशियाना बना चुके थे, की एकाएक मेरी नज़र एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति पर पड़ी जिसकी उम्र लगभग 55-60 वर्ष के आस पास होगी वो बारिश होने के बावजूद एक अस्पताल के बाहर एक कोने में बांस को डंडी से रंग बिरंगे गुब्बारे और साथ में हरे रंग के प्लास्टिक के तोते बेच रहा था मुझे यह देख कर अजीब लगा समझ नहीं आया की क्या है ये? 
एक पल को तो लगा या तो इस आदमी के भीतर की तमाम मानवीय भावनाएं मिट चुकी हैं, या तो यह इतना मजबूर है कि इसे पता नहीं है कि अपनी रोजी रोटी के लिए कहाँ जाए क्या सही जगह है पर मेरे दिमाग ने मुझे एक सुझाव और दिया ये भी तो हो सकता है ये कोई एक ऐसा फरिश्ता है ईश्वर का जो तमाम उदासी और मायूसियात के बीच तनिक सी खुशियां तनिक सी बहार लाने बैठा है कि शायद इन्हें देख कर ही लोग अपने भीतर जीने की, अपनों के तबियत की मरम्मत की उम्मीद पल लें। यह सोचते सोचते मैं बहुत खुश होगया है इतना खुश की पूरे दिन में मुझपर हुए सारे ज़ुल्म मैं भूल गया। मैं उस गुब्बारे वाले की तरफ बढ़ा की पुछू तो सही की वह यहाँ क्यों खड़ा है पर फिर इस डर से थम गया कि कहीं उसका जवाब मेरी सोच से भिन्न न हो, मैं अपनी गाड़ी से उसके बगल से निकला पर उसकी तरफ बिना देखे आगे बढ़ गया। और उसे ऊपरवाले का फरिश्ता मान कर घर आगया। उसकी सच्चाई जानने की दिल में आरजू बहुत थी पर अपनी आरजू को अपनी मुस्कराहट के पीछे दबा कर मैं आगे बढ़ गया।

Wednesday, 29 May 2019

दिल वालों की दिल्ली के धक्के।

अलग अलग शहरों में जाकर दिल भी अजीब अजीब स्वांग रचता है, कभी मन दार्शनिक हो जाता है, कभी करुण कभी इतना बेरहम की खुद पर भी तरस न आए। लेकिन हर बार जो एक सा रहता है वो ये इंसानों की एक नई प्रजाति या यूँ कह लें कि उनकी नयी नयी हरकतें पता चलती हैं।
यही कुछ 1 साल बाद मैं दिल्ली वापस आया था अपनी ऎसी वाली गाड़ी से ज्यो ही उतरा गर्मी का एक झन्नाटेदार एक थप्पड़ पड़ा मानो दिल्ली कह रही हो मियां वापस जाओ इधर तुम्हारा गुज़ारा मुश्किल है, हम भी ठहरे ढीठ, होगी दिल्ली सल्तनत कभी पर हम भी नवाबों के शहर से थे उठ खड़े हुए और आगये बहार गाड़ी के ड्राइवर पर तब मुझे गुस्सा आया जब वो मुझे इतनी गर्मी के रोक कर बोला साहब ज़रा रेटिंग जरूर दे देना मन तो किआ उसके सितारे गर्दिश में कर दूँ लेकिन अपने फ़ोन में 5 सितारे उसके नाम किये और उससे अलविदा ले ली। जैसे तैसे दोपहरी बीती शाम हुई तो अपने दूसरे ठिकाने की ओर चलने का मन बनाया। हम ठहरे बंजारे एक जगह रुक कर गुज़ारा करना तो मानो खुद के साथ ज्यादादती थी। चलने के मन से ही मन में सबसे पहले मेट्रो आई फिर मेट्रो की भीड़ एक बार को हम ठिठक गये पर खुद को ढांढस बंधाया और निकल पड़े। एक झोला पीछे एक आगे और एक जिसमें पहिये लगे थे उसे बनाई अपनी लाढ़िया, अब आप सोचेंगे लाढ़िया क्या है? तो आप में से जो गांव से ताल्लुक रखते होंगे उन्हें पता होगा लाढ़िया क्या होता है। खैर चल दिए हम जब मेट्रो पहुंचे तो ऐसे लगा होली मिलन मेले के आगया हूँ, बीएस फर्क इतना था कि किसी को किसी से मिलने की तो क्या टकराने के बाद माफ़ी मांगने की भी फुर्सत नहीं थी। समझ नहीं आया ये प्रगति करते भारत की दशा है या मानवता को बाय बाय बोलते युवा। ये सोच ही रहा था कि पीछे से स्टाइल में एक्सक्यूज़ में बोलती हुई राजधानी एक्सप्रेस की स्पीड से आती हुई मोहतरमा ने जोरदार अपने झोले की टक्कर मारी और निकल गयी, उन मोहतरमा को अदब का पाठ पढ़ाते इससे पहले ही वो उड़नछू होगयी, उसके बाद ये सिलसिला तो जैसे चल निकला वो मैडम तो बस ट्रेलर थी हमे धक्का खाए जा रहे थे लोग खिलाए जा रहे थे, हमे लग रहा था कि हम फुटबाल के मैदान में आगये हैं लोग हमें जी भर लुढ़का रहें हैं कभी इधर से कभी उधर से जैसे मानो ये उनका हक हो इसी लिए आए हों। शाम के 6 बज रहे थे हमने सुना था कि यह वही वक़्त होता है जब सारे 9-5 वाले बॉस की फटकार से संचालित होने वाले रोबोट नुमा इंसान इस मेट्रो से उस मेट्रो भागा करते हैं जिनको मानो ठहरना आता ही नहीं है और ताज्जुब की बात यह है कि वे इसपर खुद पर फर्क करते हैं ऊपरवाला ही जाने क्यों? खैर हमारी भी रेलगाड़ी आगयी माफ़ी माफ़ी 'माय मेट्रो' आगयी, उसपर किसी तरह घुसे घुस रहे थे तो मालूम पड़ रहा था कि किसी तबेले से छोटी भैसों के बीच घुस रहा हूँ, जिनको बस घुसने से मतलब है बाकी दुनिया जाए फट्टे में। घुस तो गया लेकिन अभी मशक्कत कम नहीं थी कभी इधर से एक्सक्यूज़ मी का तमाचा होता था कभी एक्सक्यूज़ मी की गुलाबी बौछार, ऐसे लगता था एक बार पापा का झापड़ पद रहा है तो दूसरी ओर मम्मी की पुचकार। तीन जगह मेट्रो बदली हर जगह वही तबेला वही एक्सक्यूज़ मी की बौछार, वही फुटबाल वाला अनुभव, कभी अगर आप खड़े हो जाओ मेट्रो पर तो आधी जनता आपको 'मे आई हेल्प यू' का काउंटर समझ बैठती है, खैर उसमे कोई हर्ज नहीं है बस एक वाकया है। जब तक मैं फुटबाल बनकर मेट्रो के साथ खेल रहा था और मेट्रो मेरे साथ तब तक तो सब सुबाह्नल्ला था जैसे ही मेट्रो स्टेशन के बहार निकलना वही थपेड़ा जो आते ही पड़ा था फिर पड़ा इसबार और जोरदार था धुप नहिं थी मगर लाल पीली बत्तीयां जलाए मोटर गाड़ियों की पी पी पी से ऐसा लग रहा था कि ऐसे म्यूजिक फेस्टिवल में आ बैठे हैं जहाँ कलाकार बहुत हैं पर उनको सुनने वाले दर्शक सबके अपने अपने हैं तो सब अपनी ताल बजाए जा रहे हैं और खुद को उस्ताद बताए जा रहें हैं। खैर इन्ही सब के बीच गिरते पड़ते पहुंचे अपने यार के घर जहाँ 20×10 के कमरे में 4 जने सरकारी दफ्तर की तरह हर ओर किताबों से घिरे ट्रॉपिक ऑफ़ कैंसर से कौनसा शहर गुजरता है इसपर बेहेस किये जा रहे थे। मैं उठा बालकनी में आया और और बस रात में ऊँची ऊँची इमारतों से चमचमाती बत्तियों को देखने में मशगूल होगया। मेरी शाम वहीं ढल चुकी थी।

Thursday, 9 May 2019

मेरा शहर- Part 2

न जाने ऐसा क्या है मेरे शहर लखनऊ में जब जब इस ओर घूमता हूँ दिल ऐसा दार्शनिक हो उठता है कि कभी कभी खुद से डर लगता है। खैर अब जब दिल दार्शनिक हुआ है तो सोचा थोड़ी कलम भी चला लें। आने के एक रोज़ बाद ज़रा एक शायरी लिखी तो लगा चलो थोड़ा कुछ और लिखते हैं। और जनाब ये तो सबको पता है कि साल के इस वक़्त पर गर्मी अपने पूरे जोश में होती है। ऐसे ही एक दोपहर घर में बैठा था, सब सो रहे थे घर के बड़े बच्चे किसी कमरे में बंद खुसुर फुफुसुर कर रहे थे, छोटे बच्चे गर्मी में बेहाल थे मगर फिर भी उनका पब्जी नहीं छूट रहा था, एक ही कमरे में ऊपर वाला पंखा चल रहा था नीचे कूलर कहना मुश्किल है कि हवा आ रही थी या नहीं गर्मी ने जो बंदोबस्त हमारे लिए किया था उसकी इस खातिरदारी का शुक्रिया कर ही रहे थी लू के थपेड़े जैसा कोई चिल्लाया 'वो आगे लूट मिल रही है पोचिंकी में उतरेंगे' मैंने गर्मी से माफ़ी मांगी की भई तुम्हारा शुक्रिया अदा नहीं कर पाया इस लूट के शोर में। दिल बड़ा कश्मकश में था एक ओर घर आया था बड़े दिनों बाद तो घर पर वक़्त बिताना जैसे लाज़मी था पर दिल में तरंगे इतनी उठ रही थी की हमने कहा चलो बाल कटा के आते हैं। बाहर निकले एक ज़ोर का चांटा गाल पर रसीद हुआ सम्भले ही थे की एक और रसीद हुआ नहीं हमे मार नहीं पड़ी थी ये लू देवी जी का आशीर्वाद था। खैर गिरते पड़ते हमने अपनी स्प्लेंडर प्लस गाडी उठाई सवार हुए जैसे दरवाजे से बहार निकले गर्मी ने मानो और ज़ोर आजमाइश कर दी हो की जनाब थोड़ा तो लिहाज करो मेरा, लेकिन हम भी इरादे के पक्के स्प्लेंडर का सेल्फ दबाया और पहुँच गये अपने पुराने नव्वे के पास। गाड़ी खड़ी करने की सही जगह ढूंढी अंदर घुसे तो हमारा नव्वे मुह में मसाला दबाए मुस्कुरा दिया और बोला 'अमा आप कब आए' इतना कहकर फिर मुस्कुराया उसके दांतो में फांसी हुई केसरी सुपाड़ी की नुमाइश लग गयी। वो पहले से किसी की हजामत कर रहा था। मैं थोड़ी देर बैठा रहा, अपने 16 हजारी फ़ोन में कैसे बाल कटवाने है इस बार वो ढूढ़ा फिर अपना नंबर आने पर तकरीबन 10 मिनट तक नव्वे को ठीक उसी तरह समझाता रहा जैसे हमारे मास्टर हमे दसवीं जमात में गणित सिखाते थे। जब मुझे लगा हाँ अब ठीक है तब उसको एक आखिरी बात कही की देखो भई मन के बाल नहीं काटे तो पैसे एक नहीं दूंगा। अगले 15 मिनट तक जिस हिसाब से उसने मेरी गर्दन घुमाई मुझे पूरा एहसास था कि आज ये ठान की बैठा था कि आज या तो ये नहीं या मेरी गर्दन नहीं। खैर ऊपरवाले का शुक्र है कि उसने तमाम हिदायतों के बाद बाल मेरे दिल की तस्सली के मुताबिक ही काटे। पैसे दिए तो वह एक बार फिर मुस्कुराया और अपने दांतों की नुमाइश के साथ मुझे अलविदा कहा, निकला ही था कि मैंने देखा एक रिकशे वाला एक तकरीबन 7-8 साल के बच्चे से कह रहा था जल्दी जा वो पंप ले आ स्कूल की छुट्टी का वक़्त हो चला है बच्चो को घर वापिस लाना है वरना धुप में परेशान हो जाएंगे। जिस हक़ से उसने यह सारी बात कही मुझे यकीन है कि वो उसकी की औलाद थी। लड़का पंप लाया और देते के साथ बोला अब्बू वो स्कूल की फीस दिए 2 महीने हो गए मास्टर जीने मना कर दिया है कल से स्कूल आने से, मैंने अब्बू के माथे पर एक हलकी सी शिकन आते देखी पर वो तुरंत संभल गया और ईंट सा होकर बोला दिमाग मत ख़राब कर जल्दी हट मुझे उन बच्चो को लेने जाना है। ये वाक्या देखकर अजीब सी कुलबुलाहट दिल में उठी समझ नहीं आया वो अब्बू कठोर था या मजबूर, कठोर होने की प्रोबेबिलिटी तो मुझे कम ही लगी वाह स्कूल के नाम पर मुझे कैसे बड़े बड़े प्रोबेबिलिटी जैसे शब्द याद आ रहे हैं, खैर कठोर तो नहीं पर उस कुछ सेकेंडो की शिकन में मुझे उसकी मजबूरी जरूर दिख गयी की कैसे एक तरफ रिक्शेवाला सूट बूट टाई पहने बच्चो को लेने जाने को उतावला था कि वो बच्चे धुप में खड़े होंगे वही दूजी तरफ उसका अपना खून बिना इतनी धूप में बिना चप्पल के अपने अब्बू से गुहार लगा रहा था कि अब्बू 2 महीने की फीस भर दो। मेरा दिल कश्मकश में यूँ है के मुझे समझ नहीं आया की रिक्शेवाला उन सूट बूट टाई पहने बच्चों को लेने जाने को उतावला था या अपने खून से नज़रे न मिला पाने के कारण भाग रहा था....
मैं अपनी स्पेंडर प्लस पर बैठा उसकी रेक्सीन की गर्म गद्दी भी मानो ठंडी थी, बिना किसी हलचल के मैंने गाडी आगे बढ़ा दी और लू के थपेड़ों के बीच घर वापिस आगया।

Wednesday, 2 January 2019

मेरा शहर- एक नशा।

सर्द हवाओं और सन सनाती गाड़ियों बीच मैं भी स्पेलेंडर प्लस की  पीछे वाली सीट पर बैठा मज़े लिए जा रहा था। अँधेरी सैड़कों पर नन्ही नन्ही गाड़ियों की जलती लाल पीली बत्तियां देखने में आज कुछ अलग ही मज़ा आ रहा था। ऐसे लग रहा था मानो आज सैड़कों पर त्यौहार मानाने निकले थे लोग। इतनी ठण्ड में अक्सर खाट पर कंबल ओढ़ने के बावजूद किताब खोलते ही ठंडी लगती थी वहां तेज़ रफ़्तार में भागती गाड़ी में भी अलग की गर्मी थी। पहली बार मुह से निकलती सफ़ेद धुंए नुमा भाप का कलात्मक प्रयोग सीखा था। इन सर्द हवाओं में कुछ अलग ही सुकून था। इतना सुकून की मैं और मेरा साथी रास्ता भटक गए थे और वहां का रास्ता जहाँ हम पले बढे थे, स्कूल और कोचिंग से भागे थे। ताजुब तो इस बात का है कि हमे रास्ता भूलने का गम ही नहीं था। हम तकरीबन 50 किलोमीटर भटके कभी इस गली कभी उस गली। बढ़ती स्पीड और तेज़ चलती हवाओ के बीच मेरी आँखें  सुकून में हलकी कभी  बंद होती कभी खुलती। कुछ दूर पर जब मेरे साथी ने चाय की टपरी पर गाडी रोकी तब होश आया, पता नहीं क्या सोच रहा था? शायद यही की शहर बदल गया है या मैं, लोग बदले हैं या लोगो का नजरिया, इस कश्मकश था ही कि दो चाय मेरे सामने वाली मेज पर आ धमकी, पर मैं मस्त सोचे जा रहा था, थोड़ी देर बाद मेरा ध्यान चाय के प्याले से उठती भाप की तरफ गया और वो ऐसा लगा जैसे वो चाय का प्याला मुझसे कह रहा जो अमा  ड्रामे हो गए हों तो जल्दी पियो आउट चलते बनो बड़े आए दार्शनिक। मन ही मन मेरे मुस्कान तैर गयी और मैंने फट दे चाय का प्याला उठाया और अपने होठों से लगाया, चाय का एक घूँट अंदर जाते ही ऐसे लगा मानो समूचे शरीर में जान आगयी हो, एक बार को चाय पी कर शायरी करने का दिल किआ फिर देखा यहाँ तो बस लाल पीली बत्तियां हैं जिन्हें अपने दिल की भी सुनने की फुर्सत नहीं तो हमारी शायरी क्या चीज़। चाय खत्म कर जब वापिस गाडी पर बैठा तो महसूस हुआ हवा में कुछ नशा सा है, ये ठण्ड शाम की थी या रात की समझ नहीं आया आसमान में टिमटिमाते तारे मानो  नीचे की गाड़ी की बत्तियों से रेस लगा रहें हों।
हर लम्हा खूबसूरत था कोहरा मानो ऐसा लग रहा था जैसे नई नवेली दुल्हन ने लजा कर सफ़ेद चादर अपनी ओर खींच ली हो टिमटिमाती बत्तियां उसकी साड़ी के गोटे समान लग रहीं थी। उस दुल्हन नुमा शहर को जी किआ अपनी बाहों में भर लू। फिर लगा मुक्त रहने दूँ ज्यादा खूबसूरत लगति है। ऐसे ही नशे में शाम कब गुज़र गयी पता ही नहीं चला। बस वो नशा रगों में बसा है जब शाम परवान चढ़ती है तो एक कश लेकर यादें ताज़ा हो जाती हैं। क्या पता अब इस शहर कब आना हो।
मेरा शहर।

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