Wednesday, 14 August 2019

बदल गया आज़ादी का जश्न।



आज 15 अगस्त के दिन सुबह सुबह जब सड़कों पर निकला तो मन में एक अजीब से टीस उठ रही थी, न जाने क्यों?
मैं सैड़कों पर कदम बढ़ाए जा रहा था, अगल बगल राखी की दुकानें सजी थी, और मैं किसी विदा होती नई नवेली दुल्हन जैसे मुँह लटकाए था। मैं कोशिश जरूर कर रहा था यह जानने की कि मेरे साथ यह हो क्या रहा है? क्यों मन ऐसा चुस्त सा नहीं है। पर मेरा दिमाग मुझे किसी सरकारी दफ्तर के अफसर जैसे जवाब देने से बार-बार मना किये जा रहा था मैंने भी हार कर कोशिश छोड़ दी। चलते चलते जो एक चीज़ मैं देख रहा था वो थी स्कूल के बच्चे, उनके खिले चेहरे, चमचमाती उनकी यूनिफार्म, कुछ साइकिल पर थे तो कुछ पैदल, कुछ दोस्तों के साथ थे कुछ अकेले थे। इनको देख पर मन थोड़ा खुश सा हुआ और मुझे मेरे अपने स्कूल के दिन याद आगये की कैसे 15 अगस्त आते ही हम अपने माँ पिताजी से नए नए झंडे लाने की जिद्द करने लगते थे, और कभी कभी तो खुद सादे कागज पर ज्योमेट्री बॉक्स से पैमाना निकाल कर तिरंगा बना लिया करते थे और फिर कभी वाटर कलर, तो कभी स्केच, तो मोम वाले कलर से रंग भर लिया करते थे। और वो न टूटने वाले स्कूल से मिलने वाले लड्डुओं की उत्सुकता। एकाएक मेरी नजर इन बच्चों पर पड़ी इनके हाथ सूने थे न कोई झंडा न कोई तिरंगे का तमगा न वो ख़ुशी और न ही लड्डू, था तो उनके हाथ में लॉलीपॉप या एंड्रॉयड फ़ोन।
मन और खिन्न सा होगया बदलता बचपन देखकर, मॉडर्न होना अच्छा है, बड़े होना अच्छा पर बचपन खोना नहीं।
आज़ादी मुबारक।

Sunday, 11 August 2019

कसोल तक का सफर और शेरू। Part I

मैं हर कदम उन वादियों में बढ़ रहा था, बिना सोचे समझे। ऊँचा- नीचा रास्ता, हरी भरी झाड़ियां, अमिताभ बच्चन से भी लंबे पेड़ और अपनी आगोश में भरते दूध जैसे सफ़ेद बादल, कल कल करते झरने और मेरे साथ चलता पहाड़ी कुत्ता शेरू। एक तरफ़ा रेस हो रही थी मुझमे और शेरू में। वो भी जिद्दी था और मैं ढीठ। खैर उन खूबसूरत, नशीली वादियों का रास्ता शेरू को ही पता था तो मैं उस रेस से लगभग बाहर ही था और शायद ये बात शेरू को भी पता थी इसलिए जनाब शेरू आराम से रुक रूक कर, जगह-जगह लघु शंकाओं के स्टॉपेज लेते किसी प्राइवेट बस जैसे चल रहा था। मुझे भी इस बात का अफ़सोस नहीं था क्योंकि इन वादियों से मुझे इतना इश्क़ था कि मैं रात भर न सोने के बाद भी पहाड़ की पगडंडियों पर सध कर चल रहा था, जैसे मेरा रोज़ का आना जाना हो।
खैर ये सब बात तब की है जब मैं एक ट्रेवल कमपनी के साथ दिल्ली में रह कर, सिनेमेटोग्राफर का काम कर रहा था।
घूमने का कीड़ा मुझे बचपन से और एक जगह न रुक पाने की बीमारी भी, ये मेरी बीमारी इतनी बुरी है कि मैं बचपन में पढ़ाई भी छत पर घुमते हुए करता था। खैर तो बस इसी कीड़े ने हाथ में कैमरा थमा दिया और घूमने की लत लगा दी। और मैं निकल चला हिमाचल प्रदेश। शाम के 6 बजे मैं दिल्ली की मार पिटाई सहते और अतिशुद्ध हवा में सांस लेते हुए निकल चला। रात भर मेरी गाड़ी में गाने बजे, बारातियों जैसा डांस हुआ क्या नागिन क्या सपेरा मैं डांस का और डांस तू मेरा, कुछ ऐसा ही देखने को मिल रहा था। कुछ देर में सब सो गए और मैं खिड़की से बहार निगाह टिकाए बदलते रास्तों को देखता रहा, कैसे एक ही देश में कुछ मील के अंतर पर पानी सड़के लोग और उनकी आदतें बदल रही थीं। कहीं सड़कें सीधी, कहीं ऊँची कहीं नीची कहीं सांप जैसी तो कहीं ऐसी थी जैसे मानो किसी ने ज्योमेट्री बॉक्स वाली स्केल से सड़क खींच दी हो। उन सड़कों को देखते देखते मुझे अचानक से ज़िन्दगी के हाल याद आगये किस तरह हमारी ज़िन्दगी भी यों ही बदलती रहती है, कभी इस डगर सीधी तो कभी उस डगर टेढ़ी। यह सोचते सोचते मैंने सोचा की जब लोग इन बदलती सड़कों का मज़ा ले सकते हैं तो जिंदगी का क्यों नहीं, फिर क्यों शिकायते आती हैं? खैर ये सवाल मैं आप पर छोड़ता हूँ।

नीली-पीली-लाल बत्तीयां और हवा बदलते देखते मुझे नींद आगयी और फिर मैं उठा अगली सुबह 5:30 बजे हलकी हलकी सुबह हो चुकी थी उर्दू में कहूँ तो फ़ज़र का वक़्त था। मेरी गाड़ी थोड़ी देर में रुकी मैंने दूर से अपनी मेहबूबा को तलाशा और थोड़ी देर में मैं उसकी बाहों में नशे में धुत्त था, वो इतनी गर्म थी कि मानो कह रही जो अपने सारे गम मुझमे पिघला दो और मैं उसको देखे जा रहा था, और घूँट घूँट पिए जा रहा था, और साथ में पार्ले जी बिस्किट थोड़ा उसे खिला रहा था थोड़ा खुद खा रहा था, जी हां मैं चाय पी रहा था। कुछ देर में मेरी मेहबूब मुझसे जुदा हुई और मैंने भी उससे अलविदा ली क्योंकि मेरा इश्क़ मुझे बुला रहा था। मैं गाड़ी में चढ़ा और फिर खिड़की पर सर टिका दिया उसके बाद मुझे सिर्फ घुंगराले बालों से घुमते रास्ते, पहाड़ो की महकती खुशबु और वक़्त के साथ बहता पानी ही याद है इसके सिवा कुछ याद है तो बस बीच-बीच में शियूं-शियूं से निकलती दूसरी गाड़ियों की आवाज। मैं कब 16 घंटे का सफर पूरा कर कब कसोल पहुँच गया पता ही नहीं चला। मैं कैंप पहुंचा अपना बैग रखा कैमरा उठाया चप्पल पहनी और निकल गया पार्वती नदी के सबसे ऊंचे टीले पर, उसके बाद जो मेरे साथ हुआ वो आज भी मेरी साँसों में नशा बनकर दौड़ता है।
क्या हुआ उसके बाद इसके लिए पढ़िए भाग 2



Monday, 5 August 2019

Why we don’t trust God?




Some of you might find the blog incomplete and vague, but read it carefully you will gain a lot.

You can often listen people saying that I am atheist and that too proudly.
Existence of God has always been a big question to human as well as science. We can see number of questions popping regarding believing in God. If you are a person who believes in God and says it in a group you might become the subject of joke or might humiliation. People might start asking you questions like, have you ever seen God, if not why and do you believe in God and also how?
Some people even consider God as their ultimate sponsor, who is responsible for every MISHAP in their life.
If you believe in God, people can ask you, if God is omnipresent and he is so powerful, why I have to face different problems in life, why people are dying, why people are being murdered or families are orphaned etc. Dear it is life and it is life and it goes that way. God has not taken any responsibility, he has created this universe and has given you all the authorities and rights to live, now it is up to you how you make it. I’ve seen people saying that I was stuck in certain situation and I prayed to God but he did not come to help. Ok I have a question for them all, have you ever tried to cook vegetable? Most probably yes, so what do you do? You have to wash it, cut it, put it in a pan, add spices etc. Than you get to eat it right? That is the answer to your question, simple and sorted.


Let me tell you a short story. “ Once upon a time a village called Pamda was struck by flood, the water level was rising rapidly every second. Government ordered to evacuate the village as soon possible, the evacuation started, a team on truck came to a man and asked to come along with them but he refused saying God will help him, later the water level increased and a boat was sent for evacuation when boat came to the man he said no I won’t go in a boat the God will help me. After few hours a final evacuation team came with a helicopter to take that man but he refused again that only God will help him. The water level increased and later the man died. When the man reached heaven he was very angry, God asked the reason, he said I died due to drowning and you did not come to help me why so? God replied son who do you think sent you the truck, boat and helicopter?”
Same is with us.
Believing in God or not believing in God is up to you.
This is just a small note to tell you how to believe in God, because the only reason we don’t believe is God is that we have a lot of complains against him. But do we really deserve to complain?
Have a look at you deeds.
Good vibes.

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