मनुष्य अपना आधा जीवन इसी चिंता और परेशानी में काट जाता है लोग उसकी बात नहीं मान रहे, कौटिल्य ने कहा था कि संसार मे जन्म तो अनेक मिल जाएंगे उन जन्मो में मित्र अनेक मिल जाएंगे तरह तरह के साधन मिल जाएंगे, पत्नी छूटेगी तो वह भी दूसरी मिल जाएगी और जो नहीं मिलेगा वह है मनुष्य जीवन 84 लाख योनियों में मनुष्य जीवन पाना बड़े सौभाग्य की बात है, क्योकि मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जिसमे में भावनाए है कार्य करने और सोचने विचरने की छमता है। लेकिन मनुष्य उस छमता को अपने जीवन को सुधारने और अनुशाषित करने की बजाए दुसरो के जीवन के जीवन मे क्या हो रहा है उसपर धयान देने और उस पर अपना शाशन जमाने मे व्यस्त है। चाहे वह रिश्ता पति पत्नी के आपसी संबंध का हो भाई बहन का हो चाहे वो औलाद और अभिभावकों का हो। लोगो को समझने की जरूरत है तो वो ये है कि मनुष्य किसी की जरूरतों पर तो प्रतिबंद्ध लगा सकता है किसी के व्यक्तिगत जीवन मे हस्तछेप तो कर सकता है परंतु वह जो नहीं कर सकता वह है किसी की मष्तिस्क या किसी की सोच पर प्रतिबंद्ध नही लगा सकता लेकिन मनुष्य इस तथ्य को पूरी तरह से नजरअंदाज करते हुए अपनी ही धुन में परेशानियों का बीड़ा उठाए मजे में जिये जा रहा और अब अगर उसके जीवन मे परेशानियां न हो तो उसको उसका जीवन खाली खाली सा लगता है, मनुष्य को परेशानी में ही रस आने लगा है। जरूरत है तो इस ढर्रे को बदलने की, अब जब बात आती है बदलाव की तो लोग कहते है अर्रे साहब कहा हो पाएगा ऐसा करे बिना जीवन कहाँ जी मिलेगा, ऐसा इसलिए क्योंकि इंसान इसका आदि हो चुका है और बदलने को तैयार नहीं हाँ अगर अभी मार्किट में नया एंड्राइड फ़ोन आजाए तो फटाफट बिना सोचे बदल लेगा। हम ऐसे समाज मे रह रहे है जहाँ जिन चीज़ों का अस्तित्व कभी नही हुआ करता था उन्ही को हम अपना सारा महत्व देते नजर आ रहे हैं। हम ऐसे समाज मे रह रहे है जहां जनसंख्या तो बढ़ रही है पर मानवता काम होती जा रही। हमे सोचने की जरूरत है लोगो के जीवन मे व्यर्थ हस्तछेप करने से बचना होगा , क्योंकि अंत मे आपके हाथ मे कुछ नहीं और आप इस गलत फहमी में जीना छोड़ दे कि अपने ऐसा करने से जीवन बदल जाएगा, उसका तो सुधरेगा नहीं बल्कि आप खुद को और तनावग्रस्त कर लेंगे। सोचे विचारें अमल करें।
जीवेश नंदन।
जीवेश नंदन।