Sunday, 11 February 2018

जीवन जीने की कला।

मनुष्य अपना आधा जीवन इसी चिंता और परेशानी में काट जाता है लोग उसकी बात नहीं मान रहे, कौटिल्य ने कहा था कि संसार मे जन्म तो अनेक मिल जाएंगे उन जन्मो में मित्र अनेक मिल जाएंगे तरह तरह के साधन मिल जाएंगे, पत्नी छूटेगी तो वह भी दूसरी मिल जाएगी और जो नहीं मिलेगा वह है मनुष्य जीवन 84 लाख योनियों में मनुष्य जीवन पाना बड़े सौभाग्य की बात है, क्योकि मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जिसमे में भावनाए है कार्य करने  और सोचने विचरने की छमता है। लेकिन मनुष्य उस छमता को अपने जीवन को सुधारने और अनुशाषित करने की बजाए दुसरो के जीवन के जीवन मे क्या हो रहा है उसपर धयान देने और उस पर अपना शाशन जमाने मे व्यस्त है। चाहे वह रिश्ता पति पत्नी के आपसी संबंध का हो भाई बहन का हो चाहे वो औलाद और अभिभावकों का हो। लोगो को समझने की जरूरत है तो वो ये है कि मनुष्य किसी की जरूरतों पर तो प्रतिबंद्ध लगा सकता है किसी के व्यक्तिगत जीवन मे हस्तछेप तो कर सकता है परंतु वह जो नहीं कर सकता वह है किसी की मष्तिस्क या किसी की सोच पर प्रतिबंद्ध नही लगा सकता लेकिन मनुष्य इस तथ्य को पूरी तरह से नजरअंदाज करते हुए अपनी ही धुन में परेशानियों का बीड़ा उठाए मजे में जिये जा रहा और अब अगर उसके जीवन मे परेशानियां न हो तो उसको उसका जीवन खाली खाली सा लगता है, मनुष्य को परेशानी में ही रस आने लगा है। जरूरत है तो इस ढर्रे को बदलने की, अब जब बात आती है बदलाव की तो लोग कहते है अर्रे साहब कहा हो पाएगा ऐसा करे बिना जीवन कहाँ जी मिलेगा, ऐसा इसलिए क्योंकि इंसान इसका आदि हो चुका है और बदलने को तैयार नहीं हाँ अगर अभी मार्किट में नया एंड्राइड फ़ोन आजाए तो फटाफट बिना सोचे बदल लेगा। हम ऐसे समाज मे रह रहे है जहाँ जिन चीज़ों का अस्तित्व कभी नही हुआ करता था उन्ही को हम अपना सारा महत्व देते नजर आ रहे हैं। हम ऐसे समाज मे रह रहे है जहां जनसंख्या तो बढ़ रही है पर मानवता काम होती जा रही। हमे सोचने की जरूरत है लोगो के जीवन मे व्यर्थ हस्तछेप करने से बचना होगा , क्योंकि अंत मे आपके हाथ मे कुछ नहीं और आप इस गलत फहमी में जीना छोड़ दे कि अपने ऐसा करने से जीवन बदल जाएगा, उसका तो सुधरेगा नहीं बल्कि आप खुद को और तनावग्रस्त कर लेंगे। सोचे विचारें अमल करें।
जीवेश नंदन।

बड़ी समस्या न बन जाए सड़क किनारे छोटे तंबू।

आज अगर इंसान की बुनियादी जरूरत देखे तो वो है रोटी, कपड़ा, और मकान। इंसान एक बार को रोटी मांग कर खा लेगा कपड़े फटे पुराने मांगे पहन लेगा पर सर छुपाने के लिए मकान तो चाहिए उसका क्या? आज भारत के आज़ाद होने के 70 साल बाद भी देश मे न जाने ऐसे कितने वर्ग है जिनके पास रहने के लिए छत नही है, वो सड़क किनारे झुग्गी झोपड़ियों में रहना तो दूर पॉलीथिन के टेन्ट लगा कर अपना जीवन यापन करने पर मजबूर हैं। ऐसा ही कुछ मंजर उत्तराखंड के हरिद्वार शहर के तमाम इलाकों का है। आंकड़ो की माने तो हरिद्वार में 47 मलिन बस्तियां है जिनमें से 12 सरकारी जमीन पर बनी हुई है। यहाँ पर रहने वाले लोग पॉलीथीन के बनाए हुए टेंट या यूं कहें कि झोपड़ियों में रहने को मजबूर है, और कुछ तो गरीबों के हवा महल जैसे प्रतीत होते हैं फर्क सिर्फ इतना है कि ये महल माचिस के डिब्बे से थोड़े बड़े है और महल में खुली जगह का अभाव बिल्कुल नहीं है। हरिद्वार में श्रद्धा की कमी नहीं है पर मानवता की कमी हमे पूरी तरह से हर की पौड़ी के घाट पर देखने को मिलती है। इस काँवर के मेले में न जाने कितने श्रद्दालु की भीड़ वहां जमा है हाईवे और घाट के बीच वाले छेत्र में, इन मलिन बस्तियों में न जाने कितने ही ऐसे परिवार है जो भीख मांग कर गुज़ारा करते है और लोगो की श्रद्धा का 'फायदा' उठा कर अपना पेट पाल रहे हैं। इस डाक काँवर मेले की अगर सुरक्षा की बात की जाए तो लगभग 1 किलोमीटर में दायरे में फैली इस बस्ती में मात्र 2 घुड़सवार जवान लगाए गए हैं, बाकी की सुरक्षा शायद इसलिए नही है क्योंकि ये हरिद्वार है। इस भीड़ में कौन कितनी श्रद्धा और कितने नेक इरादे से से आया है इसका ईश्वर ही मालिक है। और अगर मान भी ले कि सुरक्षा की दृष्टि से सब ठीक रहेगा तो सबसे पहला सवाल यह उठता है कि ये बस्ती यहां है क्यों, सरकार क्या कर रही है, इनके सर की छत कहाँ है? क्या ये लोग सरकार को बस चलते फिरते वोट नज़र आते है? इनके प्रति संवैधानिक कर्त्तव्यों को शायद ऊंचे पदों पर बैठे राजनेताओं ने लगता है  काँवर मेले में पोटली बना कर गंगा में बहा दी है। अगर बात करे योजनाओं की तो कभी कभी ऐसा लगता है हमारा देश हमारा काम योजनाओं का ज्यादा है। कांग्रेस के शाशन में कांग्रेस कीे 'मलिन बस्ती पुनर्वास नीति'  2016 में आई थी पर उसके बाद भाजपा की सरकार आने के बाद यह योजना भी अन्य योजनाओं की तरह ठंडे बस्ते में बंद नज़र आ रही है और न ही भाजपा सरकार इनके लिए कोई योजना बनाती नज़र आ रही है। वाल्मीकि बस्ती,तिबड़ी ब्रह्मपुरी, हरिद्वार छेत्र  राजीव नगर वाल्मीकि बस्ती, मायापुर ऐसी न जाने कितनी ही बस्तियां है जो अवैध है और अपनी बहाली के इंतजार कर रही है। सरकार ने इनका विभाजन 3 श्रेणियों में किआ है जिनपर यह दर्शाया है कि 'ए' श्रेणि वालो को बिजली, पानी आदि मिलेगा वह भी बस कागजों पर ही है। पेयजल, सीवर, स्वछता, विद्युत, सड़क इत्यादि के प्रबंध के बारे में श्वेत कागजों पर लिखा तो बड़ा सुंदर सुंदर गया है पर ये सब सरकारी दफ्तरों की फाइलों में पड़ा धूल खा रहा है। अब इंतेज़ार है तो ये की सरकार कब चेतेगी या शायद किसी अनहोनी के इंतेज़ार में बैठी है और अगर कुछ ऊंच नीच होगयी तो सरकार एक्शन लेगी, मुआवजा देगी वरना काम तो चल ही रहा है।

Thursday, 1 February 2018

Soft story.

कार्य कोई भी हो चाहे वह बड़ा हो या छोटा फर्क नहीं पड़ता परंतु किसी भी कार्य के सफलतापूर्वक संपन्न होने के लिए एक महत्वपूर्ण, जिम्मेदार, लग्नशील और कर्मठ व्यक्तियों के संघटन की आवश्यकता होती है। भले उनका चेहरा सामने आए चाहे न आए, यह ठीक उसी प्रकार है कि किसी फिल्म के बनने के बाद सिर्फ अभिनेता या अभिनेत्रि ही पर्दे पर दिखाई देते हैं परंतु उसके पीछे न जाने कितने की व्यक्तियों की मेहनत रहती है और अगर वे न हो तो निश्चित ही यह कार्य असंभव है, उसी का एक जीत जागता उदाहरण हमे शांतिकुंज द्वारा नागपुर में आयोजित युग सृजेता युवा संकल्प समारोह में देखने को मिला। यह कार्यक्रम विशाल स्तर पर आयोजित किया गया। अमूमन कोई भी विशाल कार्यक्रम अगर आयोजित किया जाता है तो मजदूरों की आवश्यकता पड़ती है, परंतु इस कार्यक्रम की आश्चर्यजनक बात यह है कि शुरुआत से अंत तक के कार्य मे किसी भी मजदूर की आवश्यकता नहीं पड़ी, कार्य स्वयंसेवको द्वारा ही शुरू एवं संम्पन्न किआ गया। कार्यक्रम में रेला आया पर शायद ही किसी को अव्यस्था महसूस हुई होगी या शायद ही किसी को कोई असुविधा हुई होगी, चाहे वह ठहरने की व्यवस्था हो या भोजन या संचालन की ही क्यों न हो कार्य इतने अभूतपूर्व व सुलझे हुए ढंग से किआ गया कि किसी को यह एहसास ही नहीं हो पाया कि वह घर से दूर है। इतना ही नहीं प्रांगण को भव्य झाँकियों से रचनात्मक रूप से सजाया गया। एक ओर जहाँ युवा कार्यक्रम  ने युवाओँ का सृजन एवं संकल्प दिलाने का कार्य किया वहीं उन भव्य झाँकियों ने मौन रहकर भी न जाने कितने ही संदेश दिए। रंगोली से बना भारत देश का नक्शा, सजल शृद्धा- प्रखर प्रज्ञा की प्रतिमान जो पूर्णतः शांतिकुंज हरिद्वार की स्मृती करा रहा था, भव्य भारत माता की मूर्ति जो रह रहकर देशभक्ति की भावना हर युवा में जाग्रत कर रही थी, और साथ ही वसुदेव कुटुंबकम का संदेश देती हुई मशाल और ग्लोब। इतना ही नहीं परिजनों द्वारा बनाए गए आदर्श ग्राम मॉडल, स्वावलंबलन केंद्र, निर्मल गंगा मॉडल, प्रियदर्शनी, जीरो मील स्तम्भ व व्यसनमुक्ति का संदेश देता स्याह पुतला। कार्यक्रम में शायद ही कोई ऐसी वस्तु होगी जो किसी भी प्रकार का संदेश न दे रही हो, रहने के पंडाल से लेकर कार्यक्रम होने वाले प्रांगण तक। और हमे भी शायद ऐसे कई कार्यक्रम आयोजित करने और देश के तमाम हिस्सो से युवाओं को संगठित करने की आवश्यकता है तभी हम राजगुरु, सुखदेव, चंद्रशेखर आजाद, नेताजी सुभाष के सपने का भारत बनाने में सफल होंगे और इस मुहिम में गायत्री परिवार विश्व का नेतृत्व कर रहा है और सफलता के पायदान चढ़ रहा है जिससे भारत ही नही अपितु सारा विश्व महानता की ओर अग्रसर है।

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