क्रोध मानव जीवन का बलवान एवं प्रबल शत्रु है। गीता में भगवान श्री कृष्णा
दूसरे अध्याय के 63 वें श्लोक में कहते है कि क्रोध से अत्यंत मूढ़ भाव
उत्पन्न हो जाता है, मूढ़ भाव से स्मृति में भ्रम हो जाता है, स्मृति में
भ्रम हो जाने से बुद्धि अर्थात ज्ञानशक्ति का नाश हो जाता है और बुद्धि का
नाश हो जाने से वह पुरुष अपनी स्थिति से गिर जाता है। क्रोध में मनुष्य
अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण खो देता है और अपने मुख से मधुर वचन की जगह कटु
वचन बोलता है। जिसका नुकसान उसे बाद में भी उठाना पड़ता है। ऐसा कहा जाता
है की एक घण्टे का क्रोध मनुष्य शरीर एवं मन को एक सप्ताह के ज्वार के
बराबर छती पहुँचाता है, क्योंकि क्रोध से व्यक्ति का रक्त संचार अत्यधिक
बढ़ता है जिससे वह मस्तिष्क के साथ साथ शरीर को हानि पहुँचाता है। क्रोध में
व्यक्ति अपनी वासनाओं, कामनाओं और विचारों पर संयम खो देता है तथा इन पर
नियंत्रण पाना कठिन हो जाता है परंतु नियंत्रण पाने आवश्यक है और यह दम से
ही सम्भव है। चाहे हम इतिहास देख लें या पौराणिक घटनाएं उनमें से न जाने
कितनी की ऐसी है जो मात्र क्रोध के कारण ही घटी और ऐसी घटी की उथल पुथल मचा
दी। क्रोधित मनुष्य अपने जीवन की शांति खो देता है। क्रोध से न देवता
अछूते हैं और न ही मनुष्य, बस अंतर उसे नियंत्रण करने में आता है। अहंकार
से क्रोध जन्म लेता है और मनुष्य अपनी स्मृति शक्ति शनै: - शनै: गंवा देता
है। देखते ही देखते यह स्वभाव में उतर जाता है और मनुष्य को अंधकार में
धकेल देता है। क्रोध से मनुष्य की चेतना में जंग लग जाती है तथा वह अपने
सभी रिश्तों को खोने लगता है और अपयश का भागीदार बनता है।
रामचरितमानस
में जब भरत को ज्ञात होता है की कैकेयी और मंथरा के कारण उनके प्रिय
भ्राता को 14 वर्ष के लिए वनवास जाना पड़ा है, वे क्रोधित होकर अपनी माँ को
झिड़क सकते थे, मंथरा को सता सकते थे और उसे राजमहल से निकल भी सकते थे, पर
उन्होंने ऐसा नहीं किया क्योंकि भरत दम के धनी थे तथा उन्हें यह भी ज्ञात
था कि ऐसा करना इसका सही उपाय नहीं है। उसी प्रकार अगर भगवान बुद्ध भिक्षा न
मिलने और बार - बार दुत्कार सहने पर क्रोध करते तो आज वे "भगवान गौतम
बुद्ध" नहीं होते।
क्रोध का कभी भी शमन नहीं सर्वथा
दमन करना चाहिए अर्थात आत्म नियंत्रण रखना चाहिए। कोधित वही व्यक्ति होता
है जो दुर्बल होता है। क्रोध से सम्मोह उतपन्न होता है और सम्मोह से स्मृति
समाप्त होती है और स्मृति समाप्त होते ही बुद्धि का विनाश हो जाता है।
व्यक्ति के जीवन की असली परीक्षा क्रोध में होती है और हमारे अंदर क्रोध
जागते ही हमार भीतर असुर जाग जाता है और हमारी प्रवत्ति विनाशकारी बन जाती
है तथा हम पाप के भागीदार बनते है।
अगर व्यक्ति में
क्रोध ज्यादा हो तो चाहे कितनी भी ऋद्धियाँ-सिद्धयाँ हो वे किसी काम की
नहीं रह जाती है। दुर्वासा ऋषि तमाम विद्याओं का धनी माने जाते थे, उन्हीं
के समय एक राजा थे अम्भरीष कुछ ऐसी घटना घटी की ऋषि दुर्वासा ने राजा को
बिना त्रुटि के क्रोधित होकर श्राप दे दिया, राजा से नारायण से गुहार लगाई
तब राजा अम्भरीष के प्राण बचे परन्तु दुर्वासा ऋषि के प्राणों पर बन आई
किसी तरह से प्रभु की प्रार्थना से उनके प्राण बचे और उन्होंने क्षमा
मांगी।
क्रोध को सत्संग और आत्म नियंत्रण द्वारा जड़ से मिटाया जा सकता है, और क्रोध की समाप्ति ही मानव जीवन की उन्नति है।

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