Saturday, 14 September 2024

काले रंग से बैर

 बरसात की  हर एक बूंद सोनू के जिस्म को चीर रही थी, आस पास बस घने पेड़ थे। उसने कार्गो वाला काले रंग का लोअर और काले रंग की प्रिंटेड टी-शर्ट पहनी थी।

घमासान बारिश में भीगते हुए भी उसका बदन आग की तरह जल रहा था, हाथ पैर सुन्न थे। हट्टा कट्टा नवजवान लड़का बुत बनकर चांदनी पार्क के बीचों बीच अशोक के पेड़ों के नीचे खड़ा था। एक ओर सारा पार्क बारिश में आनंद लेने वाले, फुटबाल खेलने वाले और दौड़ लगाने वालों से भरा पड़ा था। और सोनू के लोअर पैंट में एक आदमी उसका लिंग पकड़े उसे बार बार ज़ोर से हिला रहा था। सोनू की उम्र महज 14-15 वर्ष रही होगी।

सोनू थोड़ी देर पहले अपने चाचा और उनके बच्चों के साथ पार्क में खेलने आया था। सोनू को नए लोगो से मिलना, उनसे बातें करना, नयी नयी चीज़ो के बारे में जानकारी रखने का बड़ा शौक था।

सोनू जब पार्क में खेलकर पेड़ के नीचे दम भर रहा था तभी उसके करीब लगभग तीस वर्ष का आदमी आया और सोनू से इधर उधर की बातें करने लगा।

उस आदमी ने बताया उसका नाम प्रतीक है और वह किसी आई आई टी कॉलेज में प्रोफेसर है। कुछ देर तक दोनों की आपस मे बातें होती रहीं। इसी बीच प्रतीक ने सोनू के बदन की तारीफ करनी शुरू कर दी कि कैसे उसका बदन छरहरा और फुर्तीला है साथ ही उसके कंधों और बाजुओं को छूने लगा। इसी बीच अचानक बारिश शुरू होगयी सोनू के चाचा जी ने उसे बुलाया और कहा, " तुम पेड़ के नीचे खड़े हो तो मेरा फोन अपनी जेब मे रख लो, नही तो भीग जाएगा और मैं ज़रा इन बच्चो को फुटबाल खिला लाऊं। 

सोनू ने फ़ोन लिए और वापस जाकर अशोक के पेड़ के नीचे खड़ा होगया। उसके वापस जाते की प्रतीक ने सोनू को अपने ओर खींचा और उसके लोअर में हाथ डाल दिया। सोनू ने कोई विरोध नही किया, सोनू सन्न था मानो उसके हाथों पैरों में जान ही नहीं है, उसके सोचने समझने, निर्णय लेने की क्षमता मानो क्षीण होगयी थी। ऐसा लग रहा ताकि मानो सोनू को सांप सूंघ गया हो।

दूसरी तरफ किसी भी प्रकार का विरोध न होने के कारण उस आदमी को मानो मनोबल मिल गया हो। वह सोनू का लिंग पकड़ कर ज़ोर ज़ोर से हिलाने लगा और मन ही मन आंखें बंद कर कुछ बुदबुदाने लगा।

चंद पल बाद भी जब उस आदमी को कोई विरोध होता न दिखाई दिया तो उसने सोनू का एक हाथ पकड़ कर अपने लिंग पर रख दिया पर इसपर सोनू की बेहोशी कुछ टूटी तो उसने अपना हाथ झटक दिया पर अभी अभी प्रतीक का हाथ सोनू के लिंग पर ही था हर वह अभी भी उसे जोरों से हिला रहा था।

सोनू निर्विरोध खड़ा था, उसे भी नही पता था क्यों.. उस आदमी ने कुछ देर बाद दूर दो कमसिन उम्र की लड़कियों की ओर इशारा किया जो बारिश में पूरी तरह भीग चुकी थी, उनके कपड़े उनके शरीर से ऐसे चिपके थे मानो वह उनके जिस्म का हिस्सा हों। उस आदमी ने कहा मैं इन दोनों लड़कियों को जनता हूँ आओ हम दोनों उनको लेकर पार्क की बिल्डिंग के पीछे चलते हैं और वही हम सब मज़े करेंगे। सोनू अभी भी बूत बनकर खड़ा था। सोनू ने लाख हिम्मत जुटाई पर उसके मुंह से एक शब्द न फूटा। सोनू वहां से कैसे निकला यह सोनू भी नही जानता या शायद वह जानकर भी इस वाक्ये को धुंधला कर देना चाहता है। 

एक बार को सोनू के दिल मे आया कि चाचा जी को बता दे और उस आदमी को पिटवा दे पर सोनू शायद इतना समझदार नही था कि वह भेद कर पाता कि असल मे इसमें गलती किसकी थी।

सोनू जब घर पहुंचा तो उसने न जाने अपने आप को कितना रगड़ रगड़ के नहलाने की कोशिश की पर खुदको मैला ही पाया।


सोनू आज बारह वर्षों बाद अखबार और टीवी पर बलात्कार की घटनाओं पर नेताओं और समाज-सुधारकों के जुमले सुन रहा था, की फलानी लड़की को बलात्कारियों का विरोध करना चाहिए था, साहस का परिचय देना चाहिए था। तब सोनू का मन हर पल इसी घटना से कौंध रहा था और आज भी वह खुदको को उस मैल से साफ करने की फ़िज़ूल कोशिश कर रहा था।

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