हमको 'एतना' तेज़ गुस्सा आया कि क्या कहें फिर क्या था हम हमारा पिट्ठू झोला और खाली ट्राली बैग लेकर भगे प्लेटफार्म नंबर 3 पर जाते जाते 3-4 लोगो से मुठभेड़ भी हुए पर सॉरी का गोंद लगा कर भागते रहे, आपको लग रहा होगा अब तो ट्रैन मिल ही जाएगी पर आप शायद भूल रहें हैं कि आजकल ज़िन्दगी हिंदी और अंग्रेजी दोनों का सफर करा रही है।
और अब आगे...
जैसे ही उतरे प्लेटफार्म नंबर 3 पर एक नई जंग शुरू हुई अब जंग थी अपना डब्बा ढूढ़ने की हमने दो लोगो से पूछा कि साहब ये D4 कहाँ मिलेगा किसी को खबर नहीं थी। हमने अपनी तेज़ नजर घुमाई और हमे कही दूर D2 चमकता दिखाई दिया, हमने अपने वन प्लस सेवन टी में समय देखा और समय हो रहा था 6 बजकर 13 मिनट हमने सोचा अब तो कौन ही रोकेगा अपनी गाड़ी में बैठने से अपने डिब्बे की ओर भागते हुए हमने कम से कम 4-5 दफा अपनी सीट का नंबर कन्फर्म किया और चढ़ गए अपने डिब्बे में, सारा डिब्बा खाली था हमने चौड़ में अपना ट्रॉली बैग अपनी सीट के नीचे धकेला और पिट्ठू बैग सीट पर फेंका और बैठ गए विंडो सीट पर, मस्त मुस्कान तैर रही थी मुखड़े पर और समय देखा तो स्क्रीन में 6 बजकर 14 मिनट चमक रहे थे, अचानक से एक epiphiny हुई अजी मेरा मतलब अचानक से एक एहसास हुआ मन किआ की ज़रा चेक करें कि डब्बा कौनसा है कॉन्फिडेंस इतना था कि बैग गाड़ी में ही छोड़ दिया और उतर गए डब्बा नंबर चेक करने, भाग कर देखा तो डब्बा मुस्काते हुए D3 चमचमा रहा था। हमने मन ही मन कहा हाय रे मोरी मैया! फिर भगे अपनी चौड़ वाली सीट पर, उठाया बैग और भगे D4 की तलाश में समय हो चला था 6 बजकर 15 मिनट और हमारा माथा टनक रहा था, तभी हमारी रेल गाड़ी ने बांग दे दी फिर भी हम भागते रहे पहले एस1 आया फिर एस2 फिर 3 करते करते एस8 तक पहुँच गए पर D4 नहीं आया फिर आगे बढ़े तो ऐसी वाले डब्बे चमक रहे थे और हमारी गाड़ी का दूसरा हार्न बज चुका था। ऑलमोस्ट उम्मीद खोते हुए हमने चार कदम और बढ़ाए की हमें थोड़ी दूर D4 चमकता दिखाई दिया हमने अपनी निन्जा रफ्तार बढ़ाई और चढ़ गए D4 में, बोगी में पहुँचे तो देखा एक भरा पूरा समूचा परिवार जिसमे तकरीबन 12 लोग थे ठुसे हुए थे और इस बार न विंडो सीट थी न aisle मन तो किआ दहाड़े मार कर रो दें पर जैसे तैसे खुद को उस भीड़ में सेट किया पर न जाने क्यों इस परिवार की 4-5 नन्ही बालिकाएँ हमें घूर रहीं थी और उनकी मातेश्वरी हमें खैर सबसे नजरें चुराई और सीट पर बैठने लगे फिर न जाने क्यों मन मे ख्याल आया कि एक दफा सीट नंबर औऱ चेक कर ले हमने अपना टिकट खोला डब्बा नंबर सीट नंबर यहां तक कि गाड़ी नंबर भी अपनी तसल्ली के लिए मिला लिया, खैर ऊपरवाले की दुआ से इस बार सब सही था। शायद पिछली बार D-4-33 होने की वजह से सब खिचड़ी होगया था और हम D-3- 33 में जा बैठे थे। अभी अपनी सीट पर बैठ भी नही पाए थे कि हमारी गाड़ी चल दी समय हो रहा था 6बजकर 17 मिनट। गाड़ी चली ही थी कुछ पांच सौ मीटर पर जाकर दोबारा रुक गयी, अब आपको तो पता ही है कि हम कितने ज्यादा ऑब्ज़र्वेन्ट इंसान हैं चूंकि हमारी सीट डब्बे के दरवाजे के बगल थी तो जैसे ही ट्रेन रुकी हमने देखा एक 23-24 साल का सांवला नवयुवक आंखों में गहरा काला सुरमा लगाए और सर पर काला गोटेदार साफा पहने दरवाजे से लटक रहा था और जैसे ही गाड़ी रुकी वो उतर गया और जाकर बगल से गुजरती पटरी पर जाकर बैठ गया कुछ सेकेंड गाड़ी रुकी और फिर हार्न देकर चल दी गाड़ी ने हौले से झटका लिया और पटरी पर सरकने लगी वो युवक वहीं बैठा रहा गाड़ी ने थोड़ी रफ्तार ली तब भी वह वही बैठा रहा फिर जब गाड़ी ज़रा तेज़ होने लगी वह भगा और चढ़ गया। तब मन मे एक एहसास आया कि शायद यह हम भारतीयों की प्रकृति में है या शायद ये फैशन में है कि अगर गाड़ी रुकी है तो अपने डब्बे से उतारना एक रिचुअल है जिसको निभाना अति आवश्यक। खैर आपको बस ये रिचुअल वाली बात ही बतानी थी बाकी तो यों ही हमने बक बक कर ली और आपको लम्बी सी कहानी सुना दी। आपने हमारी कहानी सुनी इसके लिए धन्यवाद ऐसे ही प्यार देते रहिये और बताइएगा जरूर कैसा लगा।
Shuru se leke last tak bandhe rakhti hai ye lekhani tumko mera salaam ♥️🙏
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