आज 15 अगस्त के दिन सुबह सुबह जब सड़कों पर निकला तो मन में एक अजीब से टीस उठ रही थी, न जाने क्यों?
मैं सैड़कों पर कदम बढ़ाए जा रहा था, अगल बगल राखी की दुकानें सजी थी, और मैं किसी विदा होती नई नवेली दुल्हन जैसे मुँह लटकाए था। मैं कोशिश जरूर कर रहा था यह जानने की कि मेरे साथ यह हो क्या रहा है? क्यों मन ऐसा चुस्त सा नहीं है। पर मेरा दिमाग मुझे किसी सरकारी दफ्तर के अफसर जैसे जवाब देने से बार-बार मना किये जा रहा था मैंने भी हार कर कोशिश छोड़ दी। चलते चलते जो एक चीज़ मैं देख रहा था वो थी स्कूल के बच्चे, उनके खिले चेहरे, चमचमाती उनकी यूनिफार्म, कुछ साइकिल पर थे तो कुछ पैदल, कुछ दोस्तों के साथ थे कुछ अकेले थे। इनको देख पर मन थोड़ा खुश सा हुआ और मुझे मेरे अपने स्कूल के दिन याद आगये की कैसे 15 अगस्त आते ही हम अपने माँ पिताजी से नए नए झंडे लाने की जिद्द करने लगते थे, और कभी कभी तो खुद सादे कागज पर ज्योमेट्री बॉक्स से पैमाना निकाल कर तिरंगा बना लिया करते थे और फिर कभी वाटर कलर, तो कभी स्केच, तो मोम वाले कलर से रंग भर लिया करते थे। और वो न टूटने वाले स्कूल से मिलने वाले लड्डुओं की उत्सुकता। एकाएक मेरी नजर इन बच्चों पर पड़ी इनके हाथ सूने थे न कोई झंडा न कोई तिरंगे का तमगा न वो ख़ुशी और न ही लड्डू, था तो उनके हाथ में लॉलीपॉप या एंड्रॉयड फ़ोन।
मन और खिन्न सा होगया बदलता बचपन देखकर, मॉडर्न होना अच्छा है, बड़े होना अच्छा पर बचपन खोना नहीं।
आज़ादी मुबारक।
बेहतरीन
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ReplyDeleteApne soch aur vicharo ko bahut sunder shabd dete ho tum,bahut sunder message .bahut aashirwad
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