न जाने ऐसा क्या है मेरे शहर लखनऊ में जब जब इस ओर घूमता हूँ दिल ऐसा दार्शनिक हो उठता है कि कभी कभी खुद से डर लगता है। खैर अब जब दिल दार्शनिक हुआ है तो सोचा थोड़ी कलम भी चला लें। आने के एक रोज़ बाद ज़रा एक शायरी लिखी तो लगा चलो थोड़ा कुछ और लिखते हैं। और जनाब ये तो सबको पता है कि साल के इस वक़्त पर गर्मी अपने पूरे जोश में होती है। ऐसे ही एक दोपहर घर में बैठा था, सब सो रहे थे घर के बड़े बच्चे किसी कमरे में बंद खुसुर फुफुसुर कर रहे थे, छोटे बच्चे गर्मी में बेहाल थे मगर फिर भी उनका पब्जी नहीं छूट रहा था, एक ही कमरे में ऊपर वाला पंखा चल रहा था नीचे कूलर कहना मुश्किल है कि हवा आ रही थी या नहीं गर्मी ने जो बंदोबस्त हमारे लिए किया था उसकी इस खातिरदारी का शुक्रिया कर ही रहे थी लू के थपेड़े जैसा कोई चिल्लाया 'वो आगे लूट मिल रही है पोचिंकी में उतरेंगे' मैंने गर्मी से माफ़ी मांगी की भई तुम्हारा शुक्रिया अदा नहीं कर पाया इस लूट के शोर में। दिल बड़ा कश्मकश में था एक ओर घर आया था बड़े दिनों बाद तो घर पर वक़्त बिताना जैसे लाज़मी था पर दिल में तरंगे इतनी उठ रही थी की हमने कहा चलो बाल कटा के आते हैं। बाहर निकले एक ज़ोर का चांटा गाल पर रसीद हुआ सम्भले ही थे की एक और रसीद हुआ नहीं हमे मार नहीं पड़ी थी ये लू देवी जी का आशीर्वाद था। खैर गिरते पड़ते हमने अपनी स्प्लेंडर प्लस गाडी उठाई सवार हुए जैसे दरवाजे से बहार निकले गर्मी ने मानो और ज़ोर आजमाइश कर दी हो की जनाब थोड़ा तो लिहाज करो मेरा, लेकिन हम भी इरादे के पक्के स्प्लेंडर का सेल्फ दबाया और पहुँच गये अपने पुराने नव्वे के पास। गाड़ी खड़ी करने की सही जगह ढूंढी अंदर घुसे तो हमारा नव्वे मुह में मसाला दबाए मुस्कुरा दिया और बोला 'अमा आप कब आए' इतना कहकर फिर मुस्कुराया उसके दांतो में फांसी हुई केसरी सुपाड़ी की नुमाइश लग गयी। वो पहले से किसी की हजामत कर रहा था। मैं थोड़ी देर बैठा रहा, अपने 16 हजारी फ़ोन में कैसे बाल कटवाने है इस बार वो ढूढ़ा फिर अपना नंबर आने पर तकरीबन 10 मिनट तक नव्वे को ठीक उसी तरह समझाता रहा जैसे हमारे मास्टर हमे दसवीं जमात में गणित सिखाते थे। जब मुझे लगा हाँ अब ठीक है तब उसको एक आखिरी बात कही की देखो भई मन के बाल नहीं काटे तो पैसे एक नहीं दूंगा। अगले 15 मिनट तक जिस हिसाब से उसने मेरी गर्दन घुमाई मुझे पूरा एहसास था कि आज ये ठान की बैठा था कि आज या तो ये नहीं या मेरी गर्दन नहीं। खैर ऊपरवाले का शुक्र है कि उसने तमाम हिदायतों के बाद बाल मेरे दिल की तस्सली के मुताबिक ही काटे। पैसे दिए तो वह एक बार फिर मुस्कुराया और अपने दांतों की नुमाइश के साथ मुझे अलविदा कहा, निकला ही था कि मैंने देखा एक रिकशे वाला एक तकरीबन 7-8 साल के बच्चे से कह रहा था जल्दी जा वो पंप ले आ स्कूल की छुट्टी का वक़्त हो चला है बच्चो को घर वापिस लाना है वरना धुप में परेशान हो जाएंगे। जिस हक़ से उसने यह सारी बात कही मुझे यकीन है कि वो उसकी की औलाद थी। लड़का पंप लाया और देते के साथ बोला अब्बू वो स्कूल की फीस दिए 2 महीने हो गए मास्टर जीने मना कर दिया है कल से स्कूल आने से, मैंने अब्बू के माथे पर एक हलकी सी शिकन आते देखी पर वो तुरंत संभल गया और ईंट सा होकर बोला दिमाग मत ख़राब कर जल्दी हट मुझे उन बच्चो को लेने जाना है। ये वाक्या देखकर अजीब सी कुलबुलाहट दिल में उठी समझ नहीं आया वो अब्बू कठोर था या मजबूर, कठोर होने की प्रोबेबिलिटी तो मुझे कम ही लगी वाह स्कूल के नाम पर मुझे कैसे बड़े बड़े प्रोबेबिलिटी जैसे शब्द याद आ रहे हैं, खैर कठोर तो नहीं पर उस कुछ सेकेंडो की शिकन में मुझे उसकी मजबूरी जरूर दिख गयी की कैसे एक तरफ रिक्शेवाला सूट बूट टाई पहने बच्चो को लेने जाने को उतावला था कि वो बच्चे धुप में खड़े होंगे वही दूजी तरफ उसका अपना खून बिना इतनी धूप में बिना चप्पल के अपने अब्बू से गुहार लगा रहा था कि अब्बू 2 महीने की फीस भर दो। मेरा दिल कश्मकश में यूँ है के मुझे समझ नहीं आया की रिक्शेवाला उन सूट बूट टाई पहने बच्चों को लेने जाने को उतावला था या अपने खून से नज़रे न मिला पाने के कारण भाग रहा था....
मैं अपनी स्पेंडर प्लस पर बैठा उसकी रेक्सीन की गर्म गद्दी भी मानो ठंडी थी, बिना किसी हलचल के मैंने गाडी आगे बढ़ा दी और लू के थपेड़ों के बीच घर वापिस आगया।
मैं अपनी स्पेंडर प्लस पर बैठा उसकी रेक्सीन की गर्म गद्दी भी मानो ठंडी थी, बिना किसी हलचल के मैंने गाडी आगे बढ़ा दी और लू के थपेड़ों के बीच घर वापिस आगया।
बहुत अच्छा अनुभव...
ReplyDeleteआसमां में वो ताव कहां, जो हमसे छुड़ाए लखनऊ
ReplyDeleteलखनऊ हम पर फिदा है, हम फिदा-ए-लखनऊ...
शानदार ❣️
Garmiiiii
ReplyDeleteGarmiiiii
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