Wednesday, 29 May 2019

दिल वालों की दिल्ली के धक्के।

अलग अलग शहरों में जाकर दिल भी अजीब अजीब स्वांग रचता है, कभी मन दार्शनिक हो जाता है, कभी करुण कभी इतना बेरहम की खुद पर भी तरस न आए। लेकिन हर बार जो एक सा रहता है वो ये इंसानों की एक नई प्रजाति या यूँ कह लें कि उनकी नयी नयी हरकतें पता चलती हैं।
यही कुछ 1 साल बाद मैं दिल्ली वापस आया था अपनी ऎसी वाली गाड़ी से ज्यो ही उतरा गर्मी का एक झन्नाटेदार एक थप्पड़ पड़ा मानो दिल्ली कह रही हो मियां वापस जाओ इधर तुम्हारा गुज़ारा मुश्किल है, हम भी ठहरे ढीठ, होगी दिल्ली सल्तनत कभी पर हम भी नवाबों के शहर से थे उठ खड़े हुए और आगये बहार गाड़ी के ड्राइवर पर तब मुझे गुस्सा आया जब वो मुझे इतनी गर्मी के रोक कर बोला साहब ज़रा रेटिंग जरूर दे देना मन तो किआ उसके सितारे गर्दिश में कर दूँ लेकिन अपने फ़ोन में 5 सितारे उसके नाम किये और उससे अलविदा ले ली। जैसे तैसे दोपहरी बीती शाम हुई तो अपने दूसरे ठिकाने की ओर चलने का मन बनाया। हम ठहरे बंजारे एक जगह रुक कर गुज़ारा करना तो मानो खुद के साथ ज्यादादती थी। चलने के मन से ही मन में सबसे पहले मेट्रो आई फिर मेट्रो की भीड़ एक बार को हम ठिठक गये पर खुद को ढांढस बंधाया और निकल पड़े। एक झोला पीछे एक आगे और एक जिसमें पहिये लगे थे उसे बनाई अपनी लाढ़िया, अब आप सोचेंगे लाढ़िया क्या है? तो आप में से जो गांव से ताल्लुक रखते होंगे उन्हें पता होगा लाढ़िया क्या होता है। खैर चल दिए हम जब मेट्रो पहुंचे तो ऐसे लगा होली मिलन मेले के आगया हूँ, बीएस फर्क इतना था कि किसी को किसी से मिलने की तो क्या टकराने के बाद माफ़ी मांगने की भी फुर्सत नहीं थी। समझ नहीं आया ये प्रगति करते भारत की दशा है या मानवता को बाय बाय बोलते युवा। ये सोच ही रहा था कि पीछे से स्टाइल में एक्सक्यूज़ में बोलती हुई राजधानी एक्सप्रेस की स्पीड से आती हुई मोहतरमा ने जोरदार अपने झोले की टक्कर मारी और निकल गयी, उन मोहतरमा को अदब का पाठ पढ़ाते इससे पहले ही वो उड़नछू होगयी, उसके बाद ये सिलसिला तो जैसे चल निकला वो मैडम तो बस ट्रेलर थी हमे धक्का खाए जा रहे थे लोग खिलाए जा रहे थे, हमे लग रहा था कि हम फुटबाल के मैदान में आगये हैं लोग हमें जी भर लुढ़का रहें हैं कभी इधर से कभी उधर से जैसे मानो ये उनका हक हो इसी लिए आए हों। शाम के 6 बज रहे थे हमने सुना था कि यह वही वक़्त होता है जब सारे 9-5 वाले बॉस की फटकार से संचालित होने वाले रोबोट नुमा इंसान इस मेट्रो से उस मेट्रो भागा करते हैं जिनको मानो ठहरना आता ही नहीं है और ताज्जुब की बात यह है कि वे इसपर खुद पर फर्क करते हैं ऊपरवाला ही जाने क्यों? खैर हमारी भी रेलगाड़ी आगयी माफ़ी माफ़ी 'माय मेट्रो' आगयी, उसपर किसी तरह घुसे घुस रहे थे तो मालूम पड़ रहा था कि किसी तबेले से छोटी भैसों के बीच घुस रहा हूँ, जिनको बस घुसने से मतलब है बाकी दुनिया जाए फट्टे में। घुस तो गया लेकिन अभी मशक्कत कम नहीं थी कभी इधर से एक्सक्यूज़ मी का तमाचा होता था कभी एक्सक्यूज़ मी की गुलाबी बौछार, ऐसे लगता था एक बार पापा का झापड़ पद रहा है तो दूसरी ओर मम्मी की पुचकार। तीन जगह मेट्रो बदली हर जगह वही तबेला वही एक्सक्यूज़ मी की बौछार, वही फुटबाल वाला अनुभव, कभी अगर आप खड़े हो जाओ मेट्रो पर तो आधी जनता आपको 'मे आई हेल्प यू' का काउंटर समझ बैठती है, खैर उसमे कोई हर्ज नहीं है बस एक वाकया है। जब तक मैं फुटबाल बनकर मेट्रो के साथ खेल रहा था और मेट्रो मेरे साथ तब तक तो सब सुबाह्नल्ला था जैसे ही मेट्रो स्टेशन के बहार निकलना वही थपेड़ा जो आते ही पड़ा था फिर पड़ा इसबार और जोरदार था धुप नहिं थी मगर लाल पीली बत्तीयां जलाए मोटर गाड़ियों की पी पी पी से ऐसा लग रहा था कि ऐसे म्यूजिक फेस्टिवल में आ बैठे हैं जहाँ कलाकार बहुत हैं पर उनको सुनने वाले दर्शक सबके अपने अपने हैं तो सब अपनी ताल बजाए जा रहे हैं और खुद को उस्ताद बताए जा रहें हैं। खैर इन्ही सब के बीच गिरते पड़ते पहुंचे अपने यार के घर जहाँ 20×10 के कमरे में 4 जने सरकारी दफ्तर की तरह हर ओर किताबों से घिरे ट्रॉपिक ऑफ़ कैंसर से कौनसा शहर गुजरता है इसपर बेहेस किये जा रहे थे। मैं उठा बालकनी में आया और और बस रात में ऊँची ऊँची इमारतों से चमचमाती बत्तियों को देखने में मशगूल होगया। मेरी शाम वहीं ढल चुकी थी।

6 comments:

  1. Bahut hi umda travelouge

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  2. शानदार


    रोचक और चौचक

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  3. अरे गजब भैया गजब
    A1+👌👌👌

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  4. वाह। अत्यंत साधारण भाषा इसकी USP है।

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  5. Haha... Uttam...ati uttam.

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