मैं टूटा हु, बिखरा हु, संप्रदायों में बंटा हु, दुखी हूं उखड़ा हु, जात पात में जकड़ा हूँ।
हाँ मैं भारत बोल रहा हूँ।
अपनी कहानी के पन्ने खोल रहा हूँ।
हर घड़ी आशा की किरणें खोज रहा हूँ। वार सैड़कों झेल रहा हूँ।
हाँ मैं भारत बोल रहा हूँ।
कसमें खाया करते थे जिसकी,
आज रस्मे तोड़ रहा हूँ।
हुआ लहूलुहान सैकड़ों बार,
फिर भी मौका दिया हर बार, चाहे हो अंग्रेज, पुर्तगाली, डच हो चाहे मुगलों का हमला।
अडिग खड़ा हूँ, अखंड खड़ा हूँ, भले ही थोड़ा झुका खड़ा हूँ।
दुःख होता है, जब अपने बच्चे मेरे टुकड़े करते हैं,
रोज़ सड़क पर, गली मोहल्ले उखड़े उखड़े मिलते हैं।
देखा मैंने शांतनु को,
और देखा राम को भी।
आज उन्ही के आदर्शों के चीथड़े उड़ते देख रहा हूँ।
हाँ मैं भारत बोल रहा हु अपने पन्ने खोल रहा हूँ।
जिस भूमि पर उपजे थे लव कुश, उसपर करखने बनते देख रहा हूँ।
जिसपर गांधी ने टेकि थी लाठी,
एटम बम बनते उसपर देख रहा हूँ। जिसपर जन्मे थे भगत, सुखदेव,
उस माटी पर लालों को चिल्लम फूंकते देख रहा हूँ।
जहाँ गूंजा था ओम कभी वहां गालियों का रेला झेल रहा हूँ।
विक्रमादित्य की गद्दी पर, नोटों की गद्दी देख रहा हूँ ।
हाँ मैं भारत बोल रहा हूँ।
पर फक्र मुझे है तुम सब पर,
क्योंकि तुमको बढ़ते मैं देख रहा हूँ।
प्रगति तुम्हारी है मुझसे बढ़कर,
पर संयम मेरा टूट रहा है।
कब आओगे पुत्र बनकर,
पिता तुम्हारा टूट रहा है।
असमंजस के आंसू बहा रहा है।
हाँ मैं भारत बोल रहा हूँ।
प्रगति तुहांरी अछि है, पर देखो क्या वो सच्ची है?
हाँ मैं भारत बोल रहा हूँ।
*स्वतंत्रा दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।*
🙋🤘👏
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