इतिहास तो हर देश का गौरवशाली और प्रेरणादायक होता है, क्योंकि हम सभी किसी न किसी महान पीढ़ी के वंशज हैं। लेकिन कब तक हम इतिहास का हवाला देकर छाती चौड़ी करके घूमते रहेंगे? सच तो यह है कि हर चीज़ की तरह इतिहास भी एक दिन इतिहास हो जाएगा। आने वाली पीढ़ी को क्या जवाब देंगे हम, की हम तो अपनी की समस्या नहीं सुलझा पाए इतिहास क्या रचेंगे, और तो और जो इतिहास था उसे कलंकित करने का महान कार्य जरूर कर दिया हमने इससे ज्यादा और कुछ नहीं होगा हमारे पास और समस्याएं तो हर जगह है एक नही अनेक है लेकिन उनके समाधान का हमें अंदाजा जरा भी नहीं है। भ्रष्टाचार, लालचिपन स्वार्थ, अनीति, बैर, ईर्ष्या ऐसे बहुत से अच्छे अच्छे संसाधन लेकर घूम रहे हैं हम। खैर ये सब तो एक तरफ हम आज मानवों के बराबर के हक़ तक नहीं पहुँच पाएं हैं बाकी तो जाने दीजिए। अब मानव अधिकारों में अगर बात की जाए तो सबसे पहले जो मुद्दा हर किसी के जेहन में उठता है वह है नारी और उसके अधिकार, यहीं से नारी सशक्तिकरण भी उभर कर आता है। इसके पहले जरा भी अगर बढूं उससे पहले अंग्रेजी के दो शब्द है उनपर गौर कर लेते है एक है 'वुमन एम्पावरमेंट' और दूसरा है 'फेमिनिज्म' दोनो बड़े ही जाने माने शब्द हैं आज हर कोई इनसे परिचित है और ये शब्द सुनते ही उसके पास ज्ञान का भंडार है और बिना सांस लिए लम्बा चौड़ा भाषण दे सकता है, जो हम नही जानते है वह है इन दोनों शब्दों का सही अर्थ बस भागे चले जा रहे हैं, जिनका फायदा उठा है बड़ी बड़ी कंपनियां अपनी रोटियां सेंक रही है, अब सवाल उठता है कैसे तो बात यह है कि हमेशा से ही नारियों को अर्थव्यस्था के हथियार के रूप में प्रयोग किया गया है सबसे पहले रूस की एक सिगरेट की कंपनी ने नारी सशक्तिकरण के नाम पर अपनी सिगरेट बेंची और कहा कि ये सशक्तिकरण का प्रतीक है और उसके बाद जैसे-जैसे हम बढ़ते गए इसका प्रयोग होता रहा। इसमें हमारी बॉलीवुड की अभिनेत्रियां भी पीछे नहीं हैं दीपिका पादुकोण एक विज्ञापन में कहती नज़र आती हैं कि "आई सपोर्ट सेक्स आउटसाइड मेर्रिज" क्या यही है सशक्तिकरण?, पूरा विश्व का बाजार नारी सशक्तिकरण के ठेकेदारों से भरा पड़ा है। और हम भी इसी में मौज लिए आपस मे लड़े जा रहे है और खुद को 'वेल एडुकेटेड' और 'मॉडर्न' होने का का तगमा पहनाए चले जा रहे है। खैर,अगर बात करे भारत देश की तो हम तो उस मुल्क के नागरिक है जहाँ अपने देश को भी माँपुकारते हैं। लेकिन अपनी माँ और परिवार की अन्य महिलाओं या बेटियों को दुत्कारने में जरा भी नहीं हिचकते, उसके बाद अगर वह नारी किस पराए घर की स्त्री हो तब तो क्या ही कहने। इससे जरा भी आगे बढ़ने से पहले नारी सशक्तिकरण क्या है बताना चाहूंगा। नारी सशक्तिकरण का अर्थ है कि नारियों और पुरुषों को समान हक़ मिले चाहे वह घर का हो उठा दफ्तर का।यहाँ पर यह कहना गलत होगा कि नारियों को पुरुषों के बराबर अधिकार मिले क्योंकि पुरुष नारी से ऊंचा नहीं है, दोनो एक समान है। नारी सशक्तिकरण का यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि महिलाएं वो कार्य करे जो पुरुष कर रहें हैं या करते है। नारी सशक्तिकरण तब होगा जिस दिन हम 'बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ' कहना छोड़ देंगे, और क्यो भई क्यों खाली बेटी बचाओ बेटा भी बचाओ और बेटी भी, बेटा भी पढ़ाओ और बेटी भी। जब हम इस तरह के वाक्य बोल देते हैं उसी छण नारी सशक्तिकरण का अनादर कर देते हैं, इससे हम यही संदेश देते हैं कि नारियां कमजोर हैं। आंकड़ों को देखा जाए तो नारियां फौज में पुरूषों से कंधा मिलाए खड़ी हैं, ऊंचे पदों पर बैठी हैं। किसी जाहिल ने कहा था कि अगर बेटी नही बचाओगे तो बहु कहां से लाओगे, बेटियां सिर्फ बहु बनने के लिए जन्म लेती है क्या? नारी सशक्तिकरण तो तब है जब माएं अपनी बेटियों से कहना छोड़ दे कि किसी पराए घर जाओगी तो क्या काम करोगी, या और अगर ये काम नही आएगा तो ससुराल वाले क्या कहेंगे या जमाना क्या कहेगा। बात तो तब है जब बेटियां-नारियां निर्भय होकर अपने फैसले स्वयं ले सकें। उन्हें घर मे राखि बंधने और खाना पकाने तक ही सीमित न रखा जाए, इसका यह मतलब कतई नहीं है कि वे अपने मौलिक कर्तव्य भूलें। लेकिन बात करें आज के सशक्तिकरण की तो वह मात्र अपनी चाह के कपड़े पहनने तक सीमित रह गयी हैं। आजकल की हमारी बेटियां वो सारे कार्य करना चाहती हैं जो पुरुष करते हैं, चाहे वह गलत ही क्यों न हो। जो कि हो पाना पूर्णतः असंभव है क्योंकि स्त्री अलग है और पुरुष अलग है बस अंतर जहाँ नही है वह संवैधानिक अधिकारों में। लेकिन जिस सशक्तिकरण के साक्षी हम हैं वह अराजकता और दरिद्रता से ज्यादा कुछ नहीं है। लड़कियों के देर रात से घर आना सशक्तिकरण नहीं है, लड़कियों का किसी भी समय बिना डरे और सुरक्षित घर आना सशक्तिकरण हैसिगरेट और मदिरापान करना सशक्तिकरण नही है, जो पुरुष ऐसा करते हैं उन्हें बिना डरे कान पकड़ कर सही राह पर लाना सशक्तिकरण है, छोटे कपड़े पहनना सशक्तिकरण नहीं अपने पसंद के कपड़े पहनना सशक्तिकरण है। सिर्फ मार्च 8 को ही महिला दिवस मना कर उसे न पूजें हर दिन महिला दिवस हो और हर दिन पुरूष दिवस। क्योकिं नारी सशक्तिकरण न सिर्फ पुरुषों से होगा न ही सिर्फ महिलाओं से, दोनो ही एक गाड़ी के पहिये हैं और दोनों का संतुलन और दोनों की सर्विसिंग अनिवार्य है।
अंत में
नारी से सृजन है
नारी से कल है
नारी बल है
जल है
थल है
नारी महान है
घर घर की शान है
नारी वरदान है
नारी का सम्मान कर
नारी उपकार है सत्कार कर, क्योंकि नारी का सम्मान जहां है संस्कृति का उत्थान वहाँ है।
अंत में
नारी से सृजन है
नारी से कल है
नारी बल है
जल है
थल है
नारी महान है
घर घर की शान है
नारी वरदान है
नारी का सम्मान कर
नारी उपकार है सत्कार कर, क्योंकि नारी का सम्मान जहां है संस्कृति का उत्थान वहाँ है।
👍👍 बहुत ही अच्छे विचार हैं🙏
ReplyDeletethanks
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